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Vidhan Sabha
अध्याय-2 सदस्यों का आह्वान तथा उनके बैठने की व्यवस्था

8-अध्यक्ष का निर्वाचन-      

(1) अध्यक्ष का निर्वाचन उस तिथि को किया जायेगा जो कि राज्यपाल नियत करें और प्रमुख सचिव उसकी सूचना प्रत्येक सदस्य का भेजेंगेः   

        परन्तु सभा की अवधि में होने वाली रिक्तता की दशा में इस प्रकार नियत तिथि:-

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(क) यदि सभा उस समय उपवेशन में हो तो रिक्तता होने के, तथा

(ख) यदि वह उपवेशन में न हो तो उस दिनांक के, जब सभा तदुपरान्त पहली बार समवेत हो़, पन्द्रह दिनों के भीतर होगी।

(2) इस प्रकार उप नियम (1) के अधीन नियत की गयी तिथि के पूर्व दिन के मध्याह्न से पहले किसी समय कोई सदस्य निर्वाचन के लिए किसी दूसरे सदस्य का नाम-निर्देशन प्रमुख सचिव को एक नाम-निर्देशन-पत्र देकर कर सकेंगे जिस पर प्रस्थापक के रूप में उस सदस्य के हस्ताक्षर तथा समर्थक के रूप में किसी तीसरे सदस्य के हस्ताक्षर हों और जिसमें नाम­-निर्देशित सदस्य के नाम का उल्लेख हो और उसके साथ उस सदस्य का जिसका नाम प्रस्थापित किया गया है, कथन संलग्न होगा कि निर्वाचित होने पर वह सदस्य अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए तैयार है।

(3) (क) निर्वाचन की तिथि नियत होने पर, नयी सभा की दशा में राज्यपाल द्वारा नियुक्त सदस्य तथा किसी दूसरी दशा में उपाध्यक्ष या यथास्थिति पीठासीन सदस्य उन सदस्यों के नामों को, जिनका विधिवत नाम­-निर्देशन हुआ है, उनके प्रस्थापकों और समथर्कों के नामों के साथ सभा में पढ़कर सुनायेंगे। निर्वाचन के पूर्व किसी भी समय कोई अभ्यर्थी जो इस प्रकार नाम-निर्देशित हुए हों, पीठासीन अधिकारी को इस विषय में मौखिक या लिखित रूप से सूचना देकर अपना नाम निर्वाचन से वापस ले सकेंगे। यदि वापसी के उपरान्त, अगर कोई हों, एक ही सदस्य का नाम-­निर्देशन शेष रहता है तो वह निर्वाचित घोषित किये जायेंगे और इसके लिए औपचारिक प्रस्ताव करना आवश्यक न होगा।

(ख) यदि एकाधिक सदस्यों का नाम निर्देशन शेष रहता है तो पीठासीन सदस्य उन सदस्यों को जिनके नाम में प्रस्ताव विद्यमान हों, प्रस्तावों को प्रस्तुत करने के लिए एक-एक करके पुकारेंगे और प्रस्तावक अपने को एतदविषयक कथन तक ही सीमित रखेंगे।

(४) उप नियम (३) के प्रयोजन के लिए किसी सदस्य को विधिवत नाम-निर्देशित नहीं समझा जायेगा,यदि उक्त उप नियम के अन्तर्गत नामों के पढ़े जाने के पूर्व उन्होंने अथवा उनके प्रस्थापक या समथर्कों ने सभा के सदस्य के रूप में शपथ नहीं ली हो, या प्रतिज्ञान नहीं किया हो।

(५) प्रत्येक प्रस्ताव पर मतदान शलाका द्वारा किया जायेगा। जब दो से अधिक सदस्यों का नाम-निर्देशन हुआ हो और प्रथम शलाका में कोई अभ्यर्थी अन्य अभ्यथिर्यों द्वारा प्राप्त मतों के योग से अधिक मत प्राप्त न कर पाये तब उस अभ्यर्थी को, जिसने न्यूनतम मत प्राप्त किये हों निर्वाचन से अपवर्जित कर दिया जायेगा और पुनः शलाका की जायेगी। प्रत्येक शलाका के अन्त में न्यूनतम मत पाने वाले अभ्यर्थी का नाम अपवर्जित कर दिया जायेगा और ऐसा उस समय तक होता रहेगा जब तक कोई अभ्यर्थी शेष अभ्यर्थी के मतों की, या यथास्थिति शेष अभ्यथिर्यों के मतों के योग की अपेक्षा अधिक मत प्राप्त न कर ले।

(६) जब किसी शलाका में दो या अधिक अभ्यर्थी बराबर संख्या में मत प्राप्त करें तब पर्ची डालकर यह निश्चित किया जायेगा कि उप नियम (५)के अन्तर्गत किस अभ्यर्थी को अपवर्जित किया जाये।

9­-उपाध्यक्ष का निर्वाचन-

(१) उपाध्यक्ष का निर्वाचन ऐसी तिथि को होगा जो अथ्यक्ष नियत करे और प्रमुख सचिव प्रत्येक सदस्य को इस तिथि की सूचना भेजेंगे :

                                       परन्तु इस प्रकार नियत तिथि सभा की अवधि में होने वाली रिक्तता की दशा में:-

(क) यदि सभा उस समय उपवेशन में हो तो रिक्तता होने के, तथा

(ख) यदि वह उपवेशन में न हो तो उस दिनांक के, जब सभा तदुपरान्त पहली बार समवेत हो, तीस दिनों के भीतर होगी।

(२) इस प्रकार उप नियम (१) के अधीन नियत की गयी तिथि के पूर्व दिन के मध्याह्न से पहले किसी समय कोई सदस्य निर्वाचन के लिए किसी दूसरे सदस्य का नाम-निर्देशन, प्रमुख सचिव को एक ऐसा नाम-निर्देशन-पत्र देकर कर सकेंगे जिस पर प्रस्थापक के रूप में उस सदस्य के हस्ताक्षर तथा समर्थक के रूप में किसी तीसरे सदस्य के हस्ताक्षर हों और जिसमें नाम-निर्देशित सदस्य के नाम का उल्लेख हो और उसके साथ उस सदस्य का कथन, जिसके नाम को प्रस्थापित किया गया है, संलग्न होगा कि निर्वाचित होने पर वह सदस्य उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए तैयार है।

(३) उप नियम (२) के प्रयोजनों के लिए किसी सदस्य को विधिवत नाम-निर्देशित नहीं समझा जायेगा, यदि उस उप नियम के अन्तर्गत नामों के पढ़े जाने के पूर्व उन्होने अथवा उनके प्रस्थापक या समर्थक ने सभा सदस्य के रूप में शपथ न ली हो, अथवा प्रतिज्ञान न किया हो।

(४) निर्वाचन के लिए इस प्रकार नियत तिथि को अध्यक्ष उन सदस्यों के नामों को जिनका विधिवित नाम-निर्देशन हुआ है, उनके प्रस्थापकों तथा समथर्कों के नामों के साथ सभा में पढ़कर सुनायेंगे। निर्वाचन के पूर्व किसी भी समय कोई अभ्यर्थी जो इस प्रकार नाम-निर्देशित हुआ है, पीठासीन अधिकारी को इस विषय में मौखिक या लिखित रूप से सूचना देकर अपना नाम निर्वाचन से वापस ले सकेगा, यदि वापसी के उपरान्त अगर कोई हो,एक ही सदस्य का नाम-निर्देशन शेष रहता है तो उनको निर्वाचित घोषित कर दिया जायगा और इस विषय पर औपचारिक प्रस्ताव करना आवश्यक न होगा। यदि एकाधिक सदस्यों का नाम-निर्देशन शेष रहता है तो अध्यक्ष उन सदस्यों को, जिनके नाम में प्रस्ताव विद्यमान हो, प्रस्तावों को प्रस्तुत करने के लिए एक-एक करके पुकारेंगे और प्रस्तावक अपने को एतदविषयक कथन तक ही सीमित रखेंगे।

         

(५) निर्वाचन की दशा में नियम- ८ (५) और (६) में अध्यक्ष के निर्वाचन के लिए विहित प्रक्रिया का अनुसरण किया जायेगा।

१0­-अधिष्ठाता मण्डल-

(१) प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ होने पर अध्यक्ष सभा के सदस्यों में से अधिक से अधिक दस सदस्यों का एक मण्डल नाम-निर्देशित करेंगे और उनमें से कोई एक अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में अध्यक्ष या उनकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष अथवा उपाध्यक्ष के भी अनुपस्थित होने पर पीठासीन सदस्य के कहने पर, सभा में पीठासीन हो सकेंगे।

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(२) उप नियम (१) के अन्तर्गत नाम-निर्देशित अधिष्ठाता तब तक पद धारण करेंगे जब तक कि नया अधिष्ठाता मण्डल नाम-निर्देशित न हो जाय।

११­-अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा अधिष्ठाता मण्डल की अनुपस्थिति में सभापति का निर्वाचन-

यदि अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष दोनों अनुपस्थित हों और सभा की बैठक में पीठासीन होने के लिए अधिष्ठाता मण्डल के कोई सदस्य विधिवत प्राधिकृत न हों, तो गणपूर्ति होने की दशा में निम्नलिखित ढंग से उस बैठक के लिए सभापति निर्वाचित करने के हेतु कार्यवाही की जायेगी­:-

        ‘’एक सदस्य प्रमुख सचिव को सम्बोधित करके सदन के समक्ष उस समय उपस्थित किसी दूसरे सदस्य का नाम प्रस्तावित करेंगे और यह प्रस्ताव करेंगे कि उक्त सदस्य उस समय तक पीठसीन हों जब तक संविधान अथवा नियमों के अधीन पीठासीन होने के लिए सक्षम व्यक्ति न आ जाय और ऐसे प्रस्ताव का किसी अन्य सदस्य द्वारा समर्थन हो जाने पर प्रमुख सचिव प्रस्ताव या प्रस्तावों को सदन का मत लेने के लिए रखेंगे। इस प्रकार निर्वाचित सदस्य अध्यक्ष-पीठ पर अध्यासीन होंगें।‘’

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१२-उपाध्यक्ष तथा अधिष्ठाता की शक्तियां-

उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य की, जो संविधान अथवा इस नियमावली के अन्तर्गत सभा के उपवेशन में पीठासीन होने के लिए सक्षम हों, जब वे पीठासीन हों, वही शक्तियां होंगी जो कि पीठासीन होने पर अध्यक्ष की होती हैं और ऐसी अवस्था में इस नियमावाली में अध्यक्ष से सम्बद्ध सब निर्देश उस पीठासीन व्यक्ति के प्रति निर्देश समझे जायेंगे।

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१३-अध्यक्ष द्वारा शक्तियों का प्रत्यायोजन-

अध्यक्ष किसी भी समय लिखित आज्ञा द्वारा इन नियमों के अधीनस्थ अपनी समस्त शक्तियां या कोई शक्ति उपाध्यक्ष को तथा उनकी अनुपस्थिति में अधिष्ठाता मण्डल के किसी सदस्य को प्रत्यायोजित कर सकेंगे और इसी प्रकार किसी ऐसे प्रत्यायोजन को निरस्त कर सकेंगे।

 

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