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Vidhan Sabha
अध्याय ११ विशेषाधिकार की अवहेलना तथा अवमान के प्रश्न
 

६३- विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान के प्रश्न का उठाया जाना-

किसी सदस्य के, अथवा सदन के, अथवा उसकी किसी समिति के विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान के प्रश्न को अध्यक्ष की सम्मति से-

(१) किसी सदस्य की ओर से शिकायत द्वारा,

(२) प्रमुख सचिव की ओर से प्रतिवेदन द्वारा,

(३) याचिका द्वारा, अथवा

(4) समिति के प्रतिवेदन द्वारा उठाया जा सकेगाः

                                        परन्तु यदि विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान सदन के प्रत्यक्ष ही हुआ हो तो सदन अध्यक्ष की सम्मति से, बिना किसी शिकायत के ही कार्यवाही कर सकेगा।

६४-सदस्य द्वारा शिकायत-

जो सदस्य ऐसा प्रश्न उठाना चाहें वे प्रमुख सचिव को लिखित सूचना देंगे। यदि शिकायत का आधार कोई लेख्य हो तो मूल लेख्य या उसकी प्रतिलिपि सूचना के साथ संलग्न की जायेगी।

                                    यदि शिकायत सदन के किसी सदस्य के विरूद्ध हो तो ऐसी सूचना द्वि-प्रतिक होगी जिसकी एक प्रति सम्बन्धित सदस्य को भेज दी जायेगी।

६५-ग्राह्यता की शर्तें-

(१) ऐसे प्रश्न की ग्राह्यता निम्नलिखित शर्तो से नियंत्रित होगी-

(क) प्रश्न किसी हाल ही में घटित निश्चित विषय तक निर्बद्ध हो,

(ख) सूचना के विषय से विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान का प्रश्न प्राग्दर्शन से विदित हो, तथा

(ग) ऐसे मामले में सदन का हस्तक्षेप आवश्यक होः

                                        परन्तु यदि शिकायत किसी सदस्य के विरूद्ध हो तो अध्यक्ष, अपनी सम्मति तथा ग्राह्यता सम्बन्धी अपनी स्वीकृति देने के पूर्व सदस्य को, सम्बद्ध लेख्यों, यदि कोई हो, के निरीक्षण का अवसर देकर सुनेंगे और आवश्यकता होने पर शिकायतकर्ता को भी सुन सकेंगे ।

(२) एक उपवेशन में एक से अधिक प्रश्न नहीं उठाये जायेंगे।

६६-शिकायत का प्रस्तुत किया जाना-

यदि इन नियमों के अन्तर्गत अध्यक्ष के मत में विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान की सूचना सम्मति योग्य तथा ग्राह्य हो तो वे उस मामले को विशेषाधिकार समिति को जांच, अनुसंधान तथा प्रतिवेदन के निमित्त निर्दिष्ट कर सकेंगे और उसकी सूचना सदन को देंगे। अध्यक्ष के मत में सूचना अग्राह्य हो तो वे अस्वीकृत की सूचना सदन को देंगे:

                                किन्तु यदि अध्यक्ष आवश्यक समझें तो अपना निर्णय देने के पूर्व सम्बन्धित सदस्य तथा अन्य सदस्यों को सुन सकेंगे।

६७-विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान के प्रश्न पर सदन द्वारा विचार-

यदि अध्यक्ष इस मत के हों कि सूचना का विषय ऐसा है जो बिना विशेषाधिकार समिति को निर्दिष्ट किये ही सदन में निस्तीर्ण किया जा सकता है तो यह प्रस्ताव किया जा सकेगा कि प्रश्न पर तत्काल या किसी आगामी तिथि पर विचार किया जाय:

                                                परन्तु यदि सूचना प्रमुख सचिव या समिति के प्रतिवेदन द्वारा अथवा याचिका द्वारा प्राप्त हुई है तो सदन में विषय पर विचार आरम्भ होने के पूर्व यदि अध्यक्ष आवश्यक समझें, तो प्रतिवेदन अथवा याचिका की प्रतियां छपवा कर सदस्यों में वितरित की जायेंगी।

६८- सदन के समक्ष शिकायत का निस्तारण-

(१) यदि सदस्य के विरूद्ध शिकायत का सदन में निस्तारणार्थ लिया जाना निश्चित हो जाय तो उक्त सदस्य को सूचना दी जायेगी और उनको स्पष्टीकरण तथा निर्दोशिता सिद्धि के संबंध में अपना पक्ष प्रस्तुत करने का तथा तत्संबंधी लेख्य या लेख्यों के निरीक्षण करने तथा प्रस्तुत करने का अवसर दिया जायेगा।

(२) वे सदस्य जिनके विरूद्ध शिकायत की गयी है, इस प्रकार नियत दिन पर सदन में उपस्थित होंगे और यदि उपस्थित होने में असमर्थ हों तो वे अध्यक्ष को अनुपस्थिति के कारण की सूचना देंगे और सदन, दिये गये कारण को देखते हुए उस विषय पर विचार स्थगित कर सकेगा। किन्तु यदि सदन की राय में अनुपस्थिति का समुचित कारण नहीं है या वह सदस्य जान-बूझकर अनुपस्थित रहे तो सदन उनकी अनुपस्थिति में ही उस विषय पर विचार प्रारम्भ कर सकेगा। यदि कोई सदस्य अनुपस्थित हो और अपरिहार्य परिस्थितिवश वे अपनी अनुपस्थिति के कारणों की सूचना न दे सके हों तो सदन उनकी प्रार्थना पर प्रश्न को पुनः विचारार्थ ले सकेगा।

(३) वे सदस्य जिनके विरूद्ध शिकायत की गयी हो सदन में उपस्थित होकर अपना स्पष्टीकरण देने के बाद सदन से बाहर चले जायेंगे और वे तब तक सदन में प्रवेश नहीं करेंगे जब तक कि वह विषय सदन के विचाराधीन रहे किन्तु सदन उन्हें कार्यवाही सुनने की अनुमति दे सकेगा और अतिरिक्त स्पष्टीकरण के लिये या क्षमा याचना के लिये उन्हें पुनः बुला सकेगा।

(४) इस नियम में उपबद्ध प्रक्रिया उन व्यक्तियों के संबंध में भी, जो सदस्य न हों, यथोचित परिवर्तनों सहित प्रवृत्त होगी।

६९- प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के उपरान्त प्रस्ताव-

प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के उपरान्त विशेषाधिकार समिति के सभापति अथवा उसके कोई सदस्य या सदन के कोई सदस्य यह प्रस्ताव कर सकेंगे कि समिति के प्रतिवेदन पर तुरन्त ही या किसी भावी समय में विचार किया जाय जिसके भीतर प्रतिवेदन मुद्रित  कराकर उसकी प्रतिलिपियां सदस्यों को दी जा सकें।

७०- मूल प्रस्ताव- जब सदन इस प्रस्ताव से-

(१) कि विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान, जो सदन के प्रत्यक्ष ही किया गया हो, के प्रश्न पर विचार किया जाय, या

(२) कि नियम ६७ के अन्तर्गत विषय पर तत्काल विचार किया जाय, या

(३) कि नियम ६९ के अन्तर्गत विशेषाधिकार समिति का प्रतिवेदन विचारार्थ लिया जाय,

                                    सहमत हो जाय तो कोई सदस्य मूल प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकेंगे जिसमें यथास्थिति विशेषाधिकार भंग अथवा अवमान अथवा प्रतिवेदन को अभिपुष्ट करते हुए सुझाव होगा कि सदन को उस पर क्या कार्यवाही करनी चाहिये तथा कोई अन्य सदस्य प्रस्ताव में संशोधन प्रस्तुत कर सकेंगे।

७१- दोषारोपित व्यक्ति के लिये अवसर-

उस दशा को छोड़कर जबकि विशेषाधिकार की अवहेलना अथवा अवमान सदन के प्रत्यक्ष किया गया हो सदन दण्ड आदेश देने के पूर्व दोषारोपित व्यक्ति को उस पर लगाये गये दोष के स्पष्टीकरण या निर्दोशिता-सिद्धि के संबंध में अपना पक्ष उपस्थित करने का अवसर देगा

                                    परन्तु यदि वह विषय विशेषाधिकार समिति को निर्दिष्ट किया जा चुका है और दोषारोपित व्यक्ति समिति के समक्ष अपना पक्ष उपस्थित कर चुका है तो जब तक सदन अन्यथा निर्देश न दे, उस व्यक्ति के लिये सदन द्वारा ऐसा अवसर दिया जाना आवश्यक न होगा।

७२- दोषारोपित पक्ष का आह्वान-

अध्यक्ष दोषारोपित व्यक्ति को सूचना अथवा बंदीकरण की अधिपत्र द्वारा कार्यवाही के किसी प्रक्रम पर सदन के सम्मुख उपस्थित होने के लिये आहूत कर सकेंगे।

७३- दण्ड-

(१) सदन स्वयं अथवा विशेषाधिकार समिति की सिफारिश पर निम्नलिखित दण्ड दे सकता है:-

    (१) भर्त्सना,

    (२) शास्ति,

    (३) सदस्य का निलम्बन,

    (४) जुर्माना,

    (५) सदस्य का निष्कासन,

    (६) कारावास, जिसकी अवधि सदन के प्रस्ताव पर निर्भर है परन्तु सत्रावसान या विघटन के उपरान्त आगे नहीं बढ़ सकती है, और

    (७) अन्य कोई दण्ड जिसे सदन अनुच्छेद १९४ के उपबन्धों के अन्तर्गत उचित और ठीक समझे।

(२) सदन की सेवा से निलम्बित सदस्य सदन के परिसर में प्रवेश करने से और सदन तथा समितियों की कार्यवाही, में भाग लेने से वर्जित रहेंगे, परन्तु अध्यक्ष किसी निलम्बित सदस्य को तदर्थ प्रार्थना किये जाने पर सदन के परिसर में किसी विशेष प्रयोजन से आने की अनुमति दे सकेंगे।

(३) सदन प्रस्ताव किये जाने पर यह आदेश कर सकेगा कि निलम्बन का दिया हुआ दण्ड या उसका असमाप्त भाग निरस्त किया जाय ।

(४) यदि नियम ७३(१) के खण्ड (४) के अनुसार किसी व्यक्ति को जुर्माना का दण्ड दिया जाता है तो जुर्माने की धनराशि की वसूली राज्य सरकार को देय ऋण के रूप में भूराजस्व के बकाये की भांति की जायेगी और वसूली का प्रमाण-पत्र सम्बन्धित जिलाधिकारी को प्रमुख सचिव के हस्ताक्षर से जारी किया जा सकेगा।

अनु0 १९४

७४- निराधार शिकायत-

ऐसी अवस्था में जबकि सदन को यह पता चले कि विशेषाधिकार की अवहेलना अथवा अवमान का आरोप निराधार है तो वह आदेश दे सकेगा कि शिकायत करने वाला उस पक्ष को जिसके विरूद्ध शिकायत की गयी हो, वाद-व्यय के रूप में ऐसी धनराशि दे जो ५०० रूपये से अधिक न होगी ।

७५- सदन के आदेश का निष्पादन-

अध्यक्ष या उनके द्वारा इस प्रयोजन के लिये प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति को यह शक्ति होगी कि सदन द्वारा दिये गये आदेशों और दण्ड का निष्पादन कर सके।

७६- वाद-विवाद की संक्षिप्तता-

विशेषाधिकार की अवहेलना अथवा अवमान विषयक प्रश्नों पर सभी प्रक्रमों में वाद-विवाद संक्षिप्त होगा।

७७- प्रक्रिया का विनियमन-

समिति में अथवा सदन में विशेषाधिकार अथवा अवमान के प्रश्न पर विचार से सम्बद्ध विषयों की प्रक्रिया को विनियमित करने के लिये अध्यक्ष ऐसे निर्देश  दे सकेंगे, जो आवश्यक हों ।

७८- विशेषाधिकार अथवा अवमान के प्रश्न को समिति को निर्दिष्ट  करने की अध्यक्ष की शक्ति-

इन नियमों में किसी बात के रहते हुए भी अध्यक्ष विशेषाधिकार अथवा अवमान के किसी प्रश्न को परीक्षा, जांच या प्रतिवेदन के लिये विशेषाधिकार समिति को निर्दिष्ट कर सकेंगे और उससे सदन को अवगत करायेंगे।

७९- एक सदन के सदस्य, अधिकारी अथवा सेवक द्वारा किसी दूसरे सदन के विशेषाधिकार की अवहेलना अथवा अवमान पर कार्यवाही की प्रक्रिया-

यदि दूसरे सदन या भारत में किसी अन्य विधान मण्डल के सदस्य, अधिकारी या सेवक इस सदन के अवमान या अभिकथित विशेषाधिकार की अवहेलना के मामले में अन्तर्ग्रस्त हो तो अध्यक्ष उस विषय को उस सदन के अधिष्ठाता अधिकारी को निर्दिष्ट कर देंगे परन्तु यदि प्रश्न उठाने वाले सदस्य को सुनने के उपरान्त अथवा जहां शिकायत किसी लेख्य पर आधारित हो वहां लेख्य का अवलोकन करने के उपरान्त अध्यक्ष को यह समाधान हो जाय कि विशेषाधिकार की कोई अवहेलना नहीं हुई है अथवा मामला इतना तुच्छ है कि उस पर ध्यान देना उचित नहीं है तो उस दशा में वे विशेषाधिकार की अवहेलना के प्रश्न को अग्राह्यकर सकेंगे। जब दूसरे सदन या भारत के किसी अन्य विधान मण्डल के अवमान अथवा विशेषाधिकार की अभिकथित अवहेलना का मामला जिसमें इस सदन के कोई सदस्य, अधिकारी या सेवक अन्तर्ग्रस्त हो, इस सदन को अवमानित सदन के अधिष्ठाता अधिकारी द्वारा निर्दिष्ट किया जाय तो अध्यक्ष उस मामले में उसी प्रकार कार्यवाही करेंगे जैसे कि यह सदन के विशेषाधिकार की अवहेलना का मामला हो और प्राप्त हुए मामले में की गयी जांच तथा कार्यवाही का प्रतिवेदन उस अधिष्ठाता अधिकारी को जिसने मामला निर्दिष्ट किया हो, भेज देंगे।

सदस्यों के बन्दीकरण, निरोध आदि और रिहाई की अध्यक्ष को सूचना

८०- दण्डाधिकारी द्वारा सदस्यों के बन्दीकरण, निरोध आदि की अध्यक्ष को सूचना-

जब कोई सदस्य किसी दोषारोपण या किसी दण्ड्य अपराध के लिये बन्दी किये जायं या उन्हें किसी न्यायालय द्वारा कारावास का दण्डादेश दिया जाय या किसी कार्यपालिका के आदेश के अन्तर्गत निरूद्ध किया जाय, तो यथास्थिति न्यायाधीश या दण्डाधिकारी या कार्यपालिका प्राधिकारी अनुसूची में दिये गये समुचित प्रपत्र में यथास्थिति, बन्दीकरण, निरोध या दोष-सिद्धि के कारण तथा सदस्य के निरोध या कारावास का स्थान भी दर्शाते हुए ऐसे तथ्य की सूचना शीध्रता  के साथ अध्यक्ष को देगा।

८१- सदस्य की रिहाई पर अध्यक्ष को सूचना-

जब कोई सदस्य बन्दी किये जायं और दोषसिद्धि के बाद अपील लम्बित होने तक जमानत पर रिहा किये जायं या अन्यथा रिहा किये जायं तो ऐसे तथ्य की सूचना भी संबंधित प्राधिकारी द्वारा अनुसूची में दिये गये समुचित प्रपत्र में अध्यक्ष को दी जायेगी।

८२- दण्डाधिकारी से प्राप्त सूचना पर कार्यवाही-

नियम ८० या ८१ में निर्दिष्ट संसूचना, जो वायरलेस संदेश, टेलीप्रिन्टर अथवा तार द्वारा भी भेजी जा सकेगी प्राप्त होने के बाद यथा संभव शीध्र अध्यक्ष उसे सदन में पढ़कर उसे सुनायेंगे, यदि वह उपवेशन में हो या यदि सदन उपवेशन में न हो तो निर्देश देंगे कि सदस्यों को उसकी सूचना दे दी जाय:

                                परन्तु यदि किसी ऐसे सदस्य के जमानत पर या अन्यथा प्रमुक्त होने की सूचना सदन को मूल कारावास की सूचना दिये जाने से पहले ही प्राप्त हो जाय तो उसके बन्दीकरण या कारावासित होने तथा बाद में प्रमुक्त होने के तथ्य को अध्यक्ष चाहें तो सदन को सूचित न करें।

सदन के परिसर के भीतर विधि सम्बन्धी आदेशिका की तामीली तथा गिरफ्तारी से संबंधित प्रक्रिया

८३- सदन के परिसर के भीतर बन्दीकरण-

सदन के परिसर के भीतर अध्यक्ष की अनुज्ञा प्राप्त किये बिना कोई गिरफ्तारी नहीं की जायेगी।

८४- विधि संबंधी आदेशिका की तामीली-

दीवानी या फौजदारी विधि संबंधी आदेशिका सदन के परिसर के भीतर अध्यक्ष की अनुज्ञा प्राप्त किये बिना तामील नहीं की जायेगी।

 

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