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Vidhan Sabha
अध्याय-1  संक्षिप्त शीर्षनाम और परिभाषाएं

1- संक्षिप्त शीर्षनाम-

यह नियमावली, "उत्तर प्रदेश विधान सभा की प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियमावली, १९५८" कहलायेगी।

२- प्रारम्भ-

ये नियम उस दिनांक से सप्रभावी होंगे जिस दिन वे उत्तर प्रदेश विधान सभा द्वारा अंगीकृत किये जायें ।

3- परिभाषाएं-

(1) इस नियमावली में, जब तक प्रसंग से अन्यथा अपेक्षित न हो-

                                         

 

(अ) "अधिवेशन" का तात्पर्य उन लगातार उपवेशनों से है जिनके अन्त में सभा अनिश्चित काल के लिये अथवा नियम १४ में उल्लिखित अधिवेशनों में से किसी अधिवेशन की प्रथम तिथि के लिये स्थगित हो;

(क) "अध्यक्ष" का तात्पर्य सभा के अध्यक्ष से है;

(ख) "अनुच्छेद" का तात्पर्य संविधान के अनुच्छेद से है;

(ग) "असरकारी सदस्य" का तात्पर्य उस सदस्य से है, जो मंत्री न हो;

(घ) "उपवेशन" का तात्पर्य किसी भी दिन कार्यारम्भ से लेकर उस दिन के लिये सदन के उठने तक सदन के सदस्यों के कार्य सम्पादनार्थ समवेत होने से है;

(ङ) "उपाध्यक्ष" का तात्पर्य सभा के उपाध्यक्ष से है;

(च) "गजट" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश सरकार के गजट से है;

(छ) "पटल" का तात्पर्य सदन के पटल से है;

(ज) "परिषद्" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश विधान परिषद् से है;

(झ) "प्रवर समिति" का तात्पर्य सदस्यों की उस समिति से है, जिसे कोई विधेयक सभा द्वारा विचार तथा प्रतिवेदन के लिये निर्दिष्ट किया जाय;

(ञ) "प्रस्ताव" का तात्पर्य, किसी सदस्य द्वारा सभा के विचारार्थ की गयी प्रस्थापना से है और उसमें संकल्प तथा प्रस्ताव के संशोधन भी सम्मिलित हैं;

(ट) "भार-साधक सदस्य'' का तात्पर्य, जहां तक उसका सम्बन्ध संकल्प अथवा प्रस्ताव से है, उस सदस्य से जिसने ऐसा संकल्प अथवा प्रस्ताव प्रस्तुत किया हो;

(ठ) ''मंत्री'' का तात्पर्य मंत्रि-परिषद् के किसी सदस्य से है, इसमें राज्य मंत्री, उप मंत्री तथा ऐसे सदस्य भी सम्मिलित हैं जिनको ऐसा मंत्री इन नियमों के अन्तर्गत सौंपे गये किसी कृत्य का प्रत्यायोजन करे;

(ड) "राज्यपाल" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश के राज्यपाल से है;

(ढ) "वित्तीय वर्ष" का तात्पर्य बारह मास की उस कालावधि से है जो पहली अप्रैल से आरम्भ होकर आगामी ३१ मार्च को समाप्त हो;

(ण) "विधान मण्डल" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश विधान मण्डल से है;

(त) ''विभाजन'' का तात्पर्य सदस्यों को सभा-कक्षों में भेजकर या अन्य किसी रीति का अनुसरण करके अभिलिखित मतदान से है;

(थ) "विधेयक भार-साधक सदस्य’’ का तात्पर्य सरकारी विधेयक के सम्बन्ध में किसी मंत्री से और अन्य विधेयकों के सम्बन्ध में उस सदस्य से है जिसने विधेयक पुरःस्थापित किया हो या उस सदस्य से है जो किसी ऐसे सदस्य द्वारा उसकी ओर से कार्य करने के लिये लिखित रूप से प्राधिकृत किया गया हो या यदि विधेयक परिषद् द्वारा भेजा गया हो तो उस मंत्री या सदस्य से है, जिसने यह प्रस्ताव करने के मंतव्य की सूचना दी हो कि विधेयक पर विचार किया जाय;

(द) "शासन" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश के शासन से है;

(ध) "संकल्प" का तात्पर्य उस प्रस्थापना से है जो सामान्य लोक हित के लिये किसी विषय पर चर्चा करने के लिये किया जाय;

(न) "संयुक्त प्रवर समिति" का तात्पर्य परिषद् तथा सभा के सदस्यों की उस समिति से है जिसे कोई विधेयक किसी भी सदन में पुरःस्थापित किये जाने के पश्चात् इन नियमों के अन्तर्गत निर्दिष्ट किया जाय;

(प) "संविधान" का तात्पर्य "भारत का संविधान" से है;

(फ) "प्रमुख सचिव" का तात्पर्य विधान सभा के प्रमुख सचिव से है और इसके अन्तर्गत ऐसे अन्य व्यक्ति का समावेश है, जो प्रमुख सचिव का कार्य करने के लिए अधिकृत हों;

(ब) "सत्र" का तात्पर्य उस कालावधि से है जो अनुच्छेद १७४ (१) के अन्तर्गत राज्यपाल द्वारा आहूत किये जाने पर सभा के प्रथम उपवेशन से उक्त अनुच्छेद खण्ड (२) के अन्तर्गत उसके सत्रावसान या विघटन तक हो;

(भ) "सत्रावसान" का तात्पर्य अनुच्छेद १७४ के खंड (२) के उपखण्ड (क) के अन्तर्गत राज्यपाल के आदेश द्वारा सत्र के समापन से है;

(म) "सदन" का तात्पर्य  विधान सभा से है;

(य) "सदन के परिसर" का तात्पर्य मुख्य विधान भवन स्थित विधान सभा मण्डप, उसकी दीर्घायें, दोनों लाबी, अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष के विधान सभा सचिवालय के नियन्त्रण अथवा अध्यासन के सभी कक्ष, विधान पुस्तकालय, विभिन्न राजनीतिक दलों को आवंटित कक्ष, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन हाल, उससे सम्बद्ध जलपान गृह़, उनके सामने के समस्त बरामदे तथा उपर्युक्त कक्षों और बरामदों में जाने वाली सीढियों से है, तथा उन स्थानों से भी है जिन्हें अध्यक्ष समय-समय पर इस हेतु निर्दिष्ट करें;

(र) ’’सदनों’’ का तात्पर्य विधान मण्डल के सदनों से है;

(ल) "सदस्य" का तात्पर्य सभा के सदस्य से है और अनुच्छेद १७७ के प्रयोजनों के लिये उसमें मंत्री तथा राज्य के महाधिवक्ता भी सम्मिलित हैं;

(व) "सदस्य को इंगित करने" का तात्पर्य किसी सदस्य के विरुद्ध कार्यवाही करने के विचार से उसके आचरण की ओर अध्यक्ष द्वारा सदन का ध्यान आकृष्ट किये जाने से है;

(श) "सभा" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश विधान सभा से है;

(ष) ''सभा-कक्ष लाबी'' से तात्पर्य उस कक्ष से है, जो सभा मंडप से संलग्न है और जो सभा मण्डप के साथ ही समाप्त होता है;

(स) ''समिति" का तात्पर्य किसी विशिष्ट या सामान्य प्रयोजन के लिये सदन द्वारा निर्वाचित या निर्मित अथवा अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित ऐसी समिति से है जो अध्यक्ष के निर्देश के अन्तर्गत कार्य करे और अपना प्रतिवेदन सदन या अध्यक्ष को प्रस्तुत करे।

(2) संविधान में प्रयुक्त शब्दों और पदों के, जिनकी परिभाषा यहां नहीं की गयी है, इन नियमों में जब तक प्रसंग से कोई दूसरा अर्थ अपेक्षित न हो, वही अर्थ होंगे जो संविधान में हैं।

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