उत्तर प्रदेश
विधान सभा की प्रक्रिया
तथा कार्य-संचालन नियमावली, १९५८
(दिनांक जनवरी, 2012 तक संशोधित)
अध्याय-1
संक्षिप्त
शीर्षनाम और परिभाषाएं
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1- संक्षिप्त
शीर्षनाम- |
यह नियमावली, "उत्तर प्रदेश
विधान सभा की प्रक्रिया
तथा कार्य-संचालन
नियमावली, १९५८" कहलायेगी। |
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२- प्रारम्भ- |
ये नियम उस
दिनांक से सप्रभावी
होंगे जिस दिन
वे उत्तर प्रदेश
विधान सभा द्वारा
अंगीकृत किये
जायें । |
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3- परिभाषाएं-
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(1) इस नियमावली
में, जब तक प्रसंग
से अन्यथा अपेक्षित
न हो- |
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(अ) "अधिवेशन"
का तात्पर्य उन
लगातार उपवेशनों
से है जिनके अन्त
में सभा अनिश्चित
काल के लिये अथवा
नियम १४ में उल्लिखित
अधिवेशनों में
से किसी अधिवेशन
की प्रथम तिथि
के लिये स्थगित
हो; |
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(क) "अध्यक्ष"
का तात्पर्य सभा
के अध्यक्ष से
है; |
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(ख) "अनुच्छेद"
का तात्पर्य संविधान
के अनुच्छेद से
है; |
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(ग) "असरकारी सदस्य"
का तात्पर्य उस
सदस्य से है, जो मंत्री न
हो; |
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(घ) "उपवेशन" का
तात्पर्य किसी
भी दिन कार्यारम्भ
से लेकर उस दिन
के लिये सदन के
उठने तक सदन के
सदस्यों के कार्य
सम्पादनार्थ
समवेत होने से
है; |
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(ङ) "उपाध्यक्ष"
का तात्पर्य सभा
के उपाध्यक्ष
से है; |
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(च) "गजट" का तात्पर्य
उत्तर प्रदेश
सरकार के गजट से
है; |
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(छ) "पटल" का तात्पर्य
सदन के पटल से है; |
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(ज) "परिषद्" का
तात्पर्य उत्तर
प्रदेश विधान
परिषद् से है; |
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(झ) "प्रवर समिति"
का तात्पर्य सदस्यों
की उस समिति से
है, जिसे कोई विधेयक
सभा द्वारा विचार
तथा प्रतिवेदन
के लिये निर्दिष्ट
किया जाय; |
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(ञ) "प्रस्ताव"
का तात्पर्य, किसी
सदस्य द्वारा
सभा के विचारार्थ
की गयी प्रस्थापना
से है और उसमें
संकल्प तथा प्रस्ताव
के संशोधन भी सम्मिलित
हैं; |
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(ट) "भार-साधक सदस्य'' का तात्पर्य, जहां तक उसका
सम्बन्ध संकल्प
अथवा प्रस्ताव
से है, उस सदस्य
से जिसने
ऐसा संकल्प अथवा
प्रस्ताव प्रस्तुत
किया हो; |
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(ठ) ''मंत्री'' का तात्पर्य
मंत्रि-परिषद्
के किसी सदस्य
से है, इसमें
राज्य मंत्री, उप मंत्री तथा
ऐसे सदस्य भी सम्मिलित
हैं जिनको ऐसा
मंत्री इन नियमों
के अन्तर्गत सौंपे
गये किसी कृत्य
का प्रत्यायोजन
करे; |
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(ड) "राज्यपाल"
का तात्पर्य उत्तर
प्रदेश के राज्यपाल
से है; |
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(ढ) "वित्तीय वर्ष" का तात्पर्य
बारह मास की उस
कालावधि से है
जो पहली अप्रैल
से आरम्भ होकर
आगामी ३१ मार्च
को समाप्त हो; |
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(ण) "विधान मण्डल"
का तात्पर्य उत्तर
प्रदेश विधान
मण्डल से है; |
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(त) ''विभाजन'' का तात्पर्य
सदस्यों को सभा-कक्षों
में भेजकर या अन्य
किसी रीति का अनुसरण
करके अभिलिखित
मतदान से है; |
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(थ) "विधेयक भार-साधक
सदस्य’’ का
तात्पर्य सरकारी
विधेयक के सम्बन्ध
में किसी मंत्री
से और अन्य विधेयकों
के सम्बन्ध में
उस सदस्य से है
जिसने विधेयक
पुरःस्थापित
किया हो या उस सदस्य
से है जो किसी ऐसे
सदस्य द्वारा
उसकी ओर से कार्य
करने के लिये लिखित
रूप से प्राधिकृत
किया गया हो या
यदि विधेयक परिषद्
द्वारा भेजा गया
हो तो उस मंत्री
या सदस्य से है, जिसने यह प्रस्ताव
करने के मंतव्य
की सूचना दी हो
कि विधेयक पर विचार
किया जाय; |
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(द) "शासन" का तात्पर्य
उत्तर प्रदेश
के शासन से है; |
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(ध) "संकल्प" का
तात्पर्य उस प्रस्थापना
से है जो सामान्य
लोक हित के लिये
किसी विषय पर चर्चा
करने के लिये किया
जाय; |
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(न) "संयुक्त प्रवर
समिति" का तात्पर्य
परिषद् तथा सभा
के सदस्यों की
उस समिति से है
जिसे कोई विधेयक
किसी भी सदन में
पुरःस्थापित
किये जाने के पश्चात्
इन नियमों के अन्तर्गत
निर्दिष्ट किया
जाय; |
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(प) "संविधान"
का तात्पर्य
"भारत का संविधान"
से है; |
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(फ) "प्रमुख सचिव"
का तात्पर्य विधान
सभा के प्रमुख
सचिव से है और इसके
अन्तर्गत ऐसे
अन्य व्यक्ति
का समावेश है, जो
प्रमुख सचिव का
कार्य करने के
लिए अधिकृत हों; |
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(ब) "सत्र" का तात्पर्य
उस कालावधि से
है जो अनुच्छेद
१७४ (१) के अन्तर्गत
राज्यपाल द्वारा
आहूत किये जाने
पर सभा के प्रथम
उपवेशन से उक्त
अनुच्छेद खण्ड
(२) के अन्तर्गत
उसके सत्रावसान
या विघटन तक हो; |
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(भ) "सत्रावसान"
का तात्पर्य अनुच्छेद
१७४ के खंड (२) के
उपखण्ड (क) के अन्तर्गत
राज्यपाल के आदेश
द्वारा सत्र के
समापन से है; |
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(म) "सदन" का तात्पर्य विधान सभा
से है; |
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(य) "सदन के परिसर"
का तात्पर्य मुख्य
विधान भवन स्थित
विधान सभा मण्डप,
उसकी दीर्घायें, दोनों लाबी, अध्यक्ष तथा
उपाध्यक्ष के
विधान सभा सचिवालय
के नियन्त्रण
अथवा अध्यासन
के सभी कक्ष, विधान पुस्तकालय, विभिन्न राजनीतिक
दलों को आवंटित
कक्ष, राजर्षि
पुरूषोत्तम दास
टंडन हाल, उससे सम्बद्ध
जलपान गृह़, उनके सामने
के समस्त बरामदे
तथा उपर्युक्त
कक्षों और बरामदों
में जाने वाली
सीढियों से है, तथा उन स्थानों
से भी है जिन्हें
अध्यक्ष समय-समय
पर इस हेतु निर्दिष्ट
करें; |
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(र) ’’सदनों’’ का तात्पर्य
विधान मण्डल के
सदनों से है; |
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(ल) "सदस्य" का
तात्पर्य सभा
के सदस्य से है
और अनुच्छेद १७७
के प्रयोजनों
के लिये उसमें
मंत्री तथा राज्य
के महाधिवक्ता
भी सम्मिलित हैं; |
|
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|
|
(व) "सदस्य को इंगित
करने" का तात्पर्य
किसी सदस्य के
विरुद्ध कार्यवाही
करने के विचार
से उसके आचरण की
ओर अध्यक्ष द्वारा
सदन का ध्यान आकृष्ट
किये जाने से है; |
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(श) "सभा" का तात्पर्य
उत्तर प्रदेश
विधान सभा से है; |
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|
|
(ष) ''सभा-कक्ष लाबी'' से तात्पर्य
उस कक्ष से है, जो सभा मंडप
से संलग्न है और
जो सभा मण्डप के
साथ ही समाप्त
होता है; |
|
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|
|
(स) ''समिति" का तात्पर्य
किसी विशिष्ट
या सामान्य प्रयोजन
के लिये सदन द्वारा
निर्वाचित या
निर्मित अथवा
अध्यक्ष द्वारा
नाम-निर्देशित
ऐसी समिति से है
जो अध्यक्ष के
निर्देश के अन्तर्गत
कार्य करे और अपना
प्रतिवेदन सदन
या अध्यक्ष को
प्रस्तुत करे। |
|
||
|
|
(2) संविधान
में प्रयुक्त
शब्दों और पदों
के, जिनकी
परिभाषा यहां
नहीं की गयी है, इन नियमों में
जब तक प्रसंग से
कोई दूसरा अर्थ
अपेक्षित न हो, वही अर्थ होंगे
जो संविधान में
हैं। |
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अध्याय-2 सदस्यों
का आह्वान तथा
उनके बैठने की
व्यवस्था |
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4-सभा का आह्वान- |
(१) समय-समय पर
सभा का आह्वान
राज्यपाल द्वारा
नियत समय और स्थान
पर समवेत् होने
के लिये किया जायेगा। |
अनु0 174(1) |
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|
|
(२) उप नियम (१) के
अन्तर्गत सदस्यों
को आह्वान-पत्र
इस प्रकार नियत
तिथि से साधारणतया
चौदह दिन पूर्व
प्रमुख सचिव द्वारा
निर्गत किये जायेंगे
: |
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परन्तु
यदि सत्र अल्पसूचना
पर या आपातिक रूप
में बुलाया जाय
तो प्रत्येक सदस्य
को आह्वान-पत्र
पृथक-पृथक निर्गत
करना आवश्यक न
होगा,
किन्तु तिथि, समय एंव स्थान
का प्रख्यापन
गजट तथा समाचार-पत्रों
में प्रकाशित
कर दिया जायेगा
और सदस्यों को
तार द्वारा सूचित
किया जायेगा। |
|
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|
5-शपथ
अथवा प्रतिज्ञान- |
सदन के प्रत्येक
सदस्य अपना स्थान
गृहण करने से पहले
राज्यपाल अथवा
उनके द्वारा एतदर्थ
नियुक्त व्यक्ति
के समक्ष, अनुच्छेद
188 के अधीन उस रूप
में जो कि संविधान
की तीसरी अनुसूची
में एतदर्थ विहित
है, शपथ गृहण
करेंगे अथवा प्रतिज्ञान
करेंगे तथा उस
पर एवं एतत् प्रयोजनार्थ
रखी गयी पंजी में, हस्ताक्षर
करेंगे। |
अनु0 188 |
||
|
6-सदस्यों
की आसन व्यवस्था- |
(क)
सदस्य
साधारणतः अध्यक्ष
द्वारा निर्धारित
व्यवस्थानुसार
बैठेंगे। (ख)
कोई
भी अन्य व्यक्ति
उस आसन पर नहीं
बैठेगा जो सभा
मण्डप में सदस्यों
के लिये अभिप्रेत
है। |
अनु0 193 |
||
|
7-अनुच्छेद
193 के उपबन्धों के
अधीन दण्ड विधि
या विधान- |
कोई भी
व्यक्ति जिसके
संबध में अध्यक्ष
यह निश्चित करे
कि वह अनुच्छेद
१९३ के अधीन दोषी
है एतदर्थ उपबन्ध
शास्ति का भागी
होगा। इस संबंध
में अध्यक्ष का
निर्णय अन्तिम
होगा। |
अनु0 193 |
||
|
अध्याय-3 अध्यक्ष
व उपाध्यक्ष का
निर्वाचन तथा
अधिष्ठाता मण्डल
का नाम-निर्देशन |
||||
|
8-अध्यक्ष का
निर्वाचन- |
(1) अध्यक्ष का
निर्वाचन उस तिथि
को किया जायेगा
जो कि राज्यपाल
नियत करें और प्रमुख
सचिव उसकी सूचना
प्रत्येक सदस्य
का भेजेंगेः परन्तु सभा
की अवधि में होने
वाली रिक्तता
की दशा में इस प्रकार
नियत तिथि:- |
अनु0 178 |
||
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|
(क) यदि
सभा उस समय उपवेशन
में हो तो रिक्तता
होने के, तथा |
|
||
|
|
(ख) यदि
वह उपवेशन में
न हो तो उस दिनांक
के, जब सभा
तदुपरान्त पहली
बार समवेत हो़, पन्द्रह दिनों
के भीतर होगी। |
|
||
|
|
(2) इस प्रकार उप
नियम (1) के अधीन नियत
की गयी तिथि के
पूर्व दिन के मध्याह्न
से पहले किसी समय
कोई सदस्य निर्वाचन
के लिए किसी दूसरे
सदस्य का नाम-निर्देशन
प्रमुख सचिव को
एक नाम-निर्देशन-पत्र
देकर कर सकेंगे
जिस पर प्रस्थापक
के रूप में उस सदस्य
के हस्ताक्षर
तथा समर्थक के
रूप में किसी तीसरे
सदस्य के हस्ताक्षर
हों और जिसमें
नाम-निर्देशित
सदस्य के नाम का
उल्लेख हो और उसके
साथ उस सदस्य का
जिसका नाम प्रस्थापित
किया गया है, कथन
संलग्न होगा कि
निर्वाचित होने
पर वह सदस्य अध्यक्ष
के रूप में कार्य
करने के लिए तैयार
है। |
|
||
|
|
(3) (क) निर्वाचन
की तिथि नियत होने
पर, नयी सभा की दशा
में राज्यपाल
द्वारा नियुक्त
सदस्य तथा किसी
दूसरी दशा में
उपाध्यक्ष या
यथास्थिति पीठासीन
सदस्य उन सदस्यों
के नामों को, जिनका
विधिवत नाम-निर्देशन
हुआ है, उनके प्रस्थापकों
और समथर्कों के
नामों के साथ सभा
में पढ़कर सुनायेंगे।
निर्वाचन के पूर्व
किसी भी समय कोई
अभ्यर्थी जो इस
प्रकार नाम-निर्देशित
हुए हों, पीठासीन
अधिकारी को इस
विषय में मौखिक
या लिखित रूप से
सूचना देकर अपना
नाम निर्वाचन
से वापस ले सकेंगे।
यदि वापसी के उपरान्त,
अगर कोई हों, एक
ही सदस्य का नाम-निर्देशन शेष
रहता है तो वह निर्वाचित
घोषित किये जायेंगे
और इसके लिए औपचारिक
प्रस्ताव करना
आवश्यक न होगा। |
|
||
|
|
(ख) यदि
एकाधिक सदस्यों
का नाम निर्देशन
शेष रहता है तो
पीठासीन सदस्य
उन सदस्यों को
जिनके नाम में
प्रस्ताव विद्यमान
हों, प्रस्तावों
को प्रस्तुत करने
के लिए एक-एक करके पुकारेंगे
और प्रस्तावक
अपने को एतदविषयक
कथन तक ही सीमित
रखेंगे। |
|
||
|
|
(४)
उप नियम
(३) के प्रयोजन के
लिए किसी सदस्य
को विधिवत नाम-निर्देशित
नहीं समझा जायेगा,यदि
उक्त उप नियम के
अन्तर्गत नामों
के पढ़े जाने के
पूर्व उन्होंने
अथवा उनके प्रस्थापक
या समथर्कों ने
सभा के सदस्य के
रूप में शपथ नहीं
ली हो, या प्रतिज्ञान
नहीं किया हो। |
|
||
|
|
(५)
प्रत्येक
प्रस्ताव पर मतदान
शलाका द्वारा
किया जायेगा।
जब दो से अधिक सदस्यों
का नाम-निर्देशन
हुआ हो और प्रथम
शलाका में कोई
अभ्यर्थी अन्य
अभ्यथिर्यों
द्वारा प्राप्त
मतों के योग से
अधिक मत प्राप्त
न कर पाये तब उस
अभ्यर्थी को, जिसने
न्यूनतम मत प्राप्त
किये हों निर्वाचन
से अपवर्जित कर
दिया जायेगा और
पुनः शलाका की
जायेगी। प्रत्येक
शलाका के अन्त
में न्यूनतम मत
पाने वाले अभ्यर्थी
का नाम अपवर्जित
कर दिया जायेगा
और ऐसा उस समय तक
होता रहेगा जब
तक कोई अभ्यर्थी
शेष अभ्यर्थी
के मतों की, या यथास्थिति
शेष अभ्यथिर्यों
के मतों के योग
की अपेक्षा अधिक
मत प्राप्त न कर
ले। |
|
||
|
|
(६) जब किसी शलाका
में दो या अधिक
अभ्यर्थी बराबर
संख्या में मत
प्राप्त करें
तब पर्ची डालकर
यह निश्चित किया
जायेगा कि उप नियम
(५)के अन्तर्गत
किस अभ्यर्थी
को अपवर्जित किया
जाये। |
|
||
|
9-उपाध्यक्ष
का निर्वाचन- |
(१) उपाध्यक्ष
का निर्वाचन ऐसी
तिथि को होगा जो
अथ्यक्ष नियत
करे और प्रमुख
सचिव प्रत्येक
सदस्य को इस तिथि
की सूचना भेजेंगे : |
|
||
|
|
परन्तु इस प्रकार
नियत तिथि सभा
की अवधि में होने
वाली रिक्तता
की दशा में:- |
|
||
|
|
(क) यदि
सभा उस समय उपवेशन
में हो तो रिक्तता
होने के,
तथा |
|
||
|
|
(ख) यदि
वह उपवेशन में
न हो तो उस दिनांक
के, जब सभा
तदुपरान्त पहली
बार समवेत हो, तीस दिनों
के भीतर होगी। |
|
||
|
|
(२) इस प्रकार उप
नियम (१) के अधीन
नियत की गयी तिथि
के पूर्व दिन के
मध्याह्न से पहले
किसी समय कोई सदस्य
निर्वाचन के लिए
किसी दूसरे सदस्य
का नाम-निर्देशन,
प्रमुख सचिव को
एक ऐसा नाम-निर्देशन-पत्र देकर कर
सकेंगे जिस पर
प्रस्थापक के
रूप में उस सदस्य
के हस्ताक्षर
तथा समर्थक के
रूप में किसी तीसरे
सदस्य के हस्ताक्षर
हों और जिसमें
नाम-निर्देशित
सदस्य के नाम का
उल्लेख हो और उसके
साथ उस सदस्य का
कथन, जिसके
नाम को प्रस्थापित
किया गया है, संलग्न होगा
कि निर्वाचित
होने पर वह सदस्य
उपाध्यक्ष के
रूप में कार्य
करने के लिए तैयार
है। |
|
||
|
|
(३) उप नियम (२) के
प्रयोजनों के
लिए किसी सदस्य
को विधिवत नाम-निर्देशित
नहीं समझा जायेगा,
यदि उस उप नियम
के अन्तर्गत नामों
के पढ़े जाने के
पूर्व उन्होने
अथवा उनके प्रस्थापक
या समर्थक ने सभा
सदस्य के रूप में
शपथ न ली हो, अथवा प्रतिज्ञान
न किया हो। |
|
||
|
|
(४) निर्वाचन के
लिए इस प्रकार
नियत तिथि को अध्यक्ष
उन सदस्यों के
नामों को जिनका
विधिवित नाम-निर्देशन
हुआ है,
उनके प्रस्थापकों
तथा समथर्कों
के नामों के साथ
सभा में पढ़कर
सुनायेंगे। निर्वाचन
के पूर्व किसी
भी समय कोई अभ्यर्थी
जो इस प्रकार नाम-निर्देशित
हुआ है, पीठासीन
अधिकारी को इस
विषय में मौखिक
या लिखित रूप से
सूचना देकर अपना
नाम निर्वाचन
से वापस ले सकेगा,
यदि वापसी के उपरान्त
अगर कोई हो,एक ही
सदस्य का नाम-निर्देशन
शेष रहता है तो
उनको निर्वाचित
घोषित कर दिया
जायगा और इस विषय
पर औपचारिक प्रस्ताव
करना आवश्यक न
होगा। यदि एकाधिक
सदस्यों का नाम-निर्देशन
शेष रहता है तो
अध्यक्ष उन सदस्यों
को, जिनके नाम में
प्रस्ताव विद्यमान
हो, प्रस्तावों
को प्रस्तुत करने
के लिए एक-एक करके
पुकारेंगे और
प्रस्तावक अपने
को एतदविषयक कथन
तक ही सीमित रखेंगे। |
|
||
|
|
(५) निर्वाचन
की दशा में नियम- ८ (५) और (६) में
अध्यक्ष के निर्वाचन
के लिए विहित प्रक्रिया
का अनुसरण किया
जायेगा। |
|
||
|
१0-अधिष्ठाता
मण्डल- |
(१) प्रत्येक वित्तीय
वर्ष के प्रारम्भ
होने पर अध्यक्ष
सभा के सदस्यों
में से अधिक से
अधिक दस सदस्यों
का एक मण्डल नाम-निर्देशित करेंगे
और उनमें से कोई
एक अध्यक्ष तथा
उपाध्यक्ष की
अनुपस्थिति में
अध्यक्ष या उनकी
अनुपस्थिति में
उपाध्यक्ष अथवा
उपाध्यक्ष के
भी अनुपस्थित
होने पर पीठासीन
सदस्य के कहने
पर, सभा में
पीठासीन हो सकेंगे। |
अनु0 180 (2) |
||
|
|
(२) उप नियम
(१) के अन्तर्गत
नाम-निर्देशित अधिष्ठाता
तब तक पद धारण करेंगे
जब तक कि नया अधिष्ठाता
मण्डल नाम-निर्देशित न हो
जाय। |
|
||
|
११-अध्यक्ष,
उपाध्यक्ष तथा
अधिष्ठाता मण्डल
की अनुपस्थिति
में सभापति का
निर्वाचन- |
यदि अध्यक्ष
तथा उपाध्यक्ष
दोनों अनुपस्थित
हों और सभा की बैठक
में पीठासीन होने
के लिए अधिष्ठाता
मण्डल के कोई सदस्य
विधिवत प्राधिकृत
न हों, तो गणपूर्ति
होने की दशा में
निम्नलिखित ढंग
से उस बैठक के लिए
सभापति निर्वाचित
करने के हेतु कार्यवाही
की जायेगी:- ‘’एक सदस्य प्रमुख
सचिव को सम्बोधित
करके सदन के समक्ष
उस समय उपस्थित
किसी दूसरे सदस्य
का नाम प्रस्तावित
करेंगे और यह प्रस्ताव
करेंगे कि उक्त
सदस्य उस समय तक
पीठसीन हों जब
तक संविधान अथवा
नियमों के अधीन
पीठासीन होने
के लिए सक्षम व्यक्ति
न आ जाय और ऐसे प्रस्ताव
का किसी अन्य सदस्य
द्वारा समर्थन
हो जाने पर प्रमुख
सचिव प्रस्ताव
या प्रस्तावों
को सदन का मत लेने
के लिए रखेंगे।
इस प्रकार निर्वाचित
सदस्य अध्यक्ष-पीठ पर अध्यासीन
होंगें।‘’ |
अनु0 180 (2) |
||
|
१२-उपाध्यक्ष
तथा अधिष्ठाता
की शक्तियां- |
उपाध्यक्ष
या अन्य सदस्य
की, जो संविधान
अथवा इस नियमावली
के अन्तर्गत सभा
के उपवेशन में
पीठासीन होने
के लिए सक्षम हों,
जब वे पीठासीन
हों, वही शक्तियां
होंगी जो कि पीठासीन
होने पर अध्यक्ष
की होती हैं और
ऐसी अवस्था में
इस नियमावाली में अध्यक्ष
से सम्बद्ध सब
निर्देश उस पीठासीन
व्यक्ति के प्रति
निर्देश समझे
जायेंगे। |
अनु0
180(2) |
||
|
१३-अध्यक्ष
द्वारा शक्तियों
का प्रत्यायोजन- |
अध्यक्ष
किसी भी समय लिखित
आज्ञा द्वारा
इन नियमों के अधीनस्थ
अपनी समस्त शक्तियां
या कोई शक्ति उपाध्यक्ष
को तथा उनकी अनुपस्थिति
में अधिष्ठाता
मण्डल के किसी
सदस्य को प्रत्यायोजित
कर सकेंगे और इसी
प्रकार किसी ऐसे
प्रत्यायोजन
को निरस्त कर सकेंगे। |
|
||
|
अध्याय
4 सभा के
उपवेशन |
||||
|
१४-सभा
के अधिवेशन- |
अनुच्छेद-१७४
के अधीन रहते हुए
साधाणतया प्रत्येक
वर्ष में सभा के
३ अधिवेशन अर्थात्
आय-व्ययक अधिवेशन,
वर्षाकालीन अधिवेशन
व शीतकालीन अधिवेशन
और ९० दिन के उपवेशन
होंगे जिसमें
यथासंभव दो माह
के अन्तराल पर
कम से कम दस कार्यकारी
दिवसों के लिये
विधान सभा का सत्र
बुलाया जायेगा। |
अनु0 174 |
||
|
१४-क
सभा के उपवेशन-
|
(१) सत्र के आरम्भ
होने के पश्चात्
सभा उन दिनों बैठेगी
जिनको अध्यक्ष
सभा के कार्य की
स्थिति को देखकर
तथा सदन के नेता
के परामर्श से
समय-समय पर निश्चित
करें। |
|
||
|
|
(२) सदन
का उपवेशन तभी
विधिवत गठित होगा
जबकि उसमें अध्यक्ष
अथवा कोई अन्य
सदस्य पीठासीन
हो जो संविधान
या इन नियमों के
अन्तर्गत सदन
के उपवेशन में
पीठासीन होने
के लिए सक्षम हों। |
|
||
|
१५-उपवेशन
का समय- |
(१) अध्यक्ष के
निर्देश के अधीन
रहते हुये सभा
का उपवेशन साधारणतया
११ बजे पूर्वाहन
से प्रारम्भ होगा
और तब तक चलेगा
जब तक उस दिन के
लिए निर्धारित
कार्य समाप्त
न हो जायः परन्तु यदि
अध्यक्ष ऐसा करना
उचित समझें या
ऐसा करना किन्हीं
परिस्थितियोंवश
आवश्यक हो जाय
तो निर्धारित
कार्य समाप्त
होने से पूर्व
भी उपवेशन स्थगित
किया जा सकता है। |
|
||
|
|
(२) जब तक
कि सदन अन्यथा
निश्चय न करे, शनिवार,
रविवार तथा अन्य
सार्वजनिक छुटि्टयों
के दिन कोई उपवेशन
नहीं होगा। |
|
||
|
१६-गणपूर्ति- |
सभा के
उपवेशन को गठित
करने के लिए गणपूर्ति
सदन के सब सदस्यों
की संख्या का दशमांश
होगा। |
अनु0
189(3) |
||
|
१७-उपवेशनों
का स्थगन- |
अध्यक्ष
स्वयं अथवा सभा
के तदविषयक प्रस्ताव
पर, सभा के उपवेशन
को स्थगित कर सकेंगेः किन्तु यदि
सदन अनिश्चित
काल के लिए स्थगित
हो तो सभा के पुनः
समवेत होने की
तिथि की सूचना
सदस्यों को साधारणतया
दस दिन पूर्व दी
जायेगीः परन्तु
अध्यक्ष सभा के
उपवेशन को उस तिथि
के पूर्व अथवा
उसके बाद की तिथि
को बुला सकेंगे
जिस तिथि के लिए
वह स्थगित हुआ
हो। |
|
||
|
१८-
सत्रावसान का
प्रभाव- |
जब सभा
सत्रावसित हो
जाय तो- |
|
||
|
|
(क) सभी लम्बित
सूचनायें, वक्तव्य
और चर्चायें व्यपगत
हो जायेंगी और
आगामी सत्र के
लिए फिर से सूचनायें
दी जायेंगीः परन्तु
जो प्रश्न कार्य-सूची
में प्रविष्ट
हो चुके हों, किन्तु
पिछले सत्र की
समाप्ति पर स्थागित
किये गये हों और
उत्तर के लिए लम्बित
हों, वे व्यपगत
नहीं होंगे; |
|
||
|
|
(ख) सत्रावसान
के समय जो विधेयक
सदन में लम्बित
हों, वह सदन के सत्रावसान
के कारण व्यपगत
नहीं होगा; |
|
||
|
|
(ग) किसी समिति
के समक्ष लम्बित
कोई कार्य व्यपगत
नहीं होगा; |
|
||
|
|
(घ) ऐसा कोई प्रस्ताव,
संकल्प अथवा संशोधन
जो उपस्थित किया
जा चुका हो और सदन
में लम्बित हो,
व्यपगत नहीं होगा। |
|
||
|
अध्याय
5 राज्यपाल
का सभा को अभिभाषण
तथा सन्देश |
||||
|
१९-
विधान मण्डल के
दोनों सदनों को
राज्यपाल का अभिभाषण
और सभा में उस पर
चर्चा- |
(१) सभा के प्रत्येक
सामान्य निर्वाचन
के उपरान्त प्रथम
सत्र के आरम्भ
में तथा प्रतिवर्ष
के प्रथम सत्र
के आरम्भ में राज्यपाल
विधान मण्डल के
एक साथ समवेत हुए
दोनों सदनों को
अभिभाषित करेंगे
तथा विधान मण्डल
को आह्वान के कारण
बतायेंगेः परन्तु सदस्यों
के विहित शपथ लेने
अथवा प्रतिज्ञान
करने का कार्य
तथा अध्यक्ष का
निर्वाचन यदि
आवश्यक हो तो राज्यपाल
के अभिभाषण के
पूर्व किया जा
सकेगा। |
अनु0 176(1) |
||
|
|
(२) राज्यपाल के
अभिभाषण के उपरान्त
सभा के प्रथम उपवेशन
में अध्यक्ष सदन
को अभिभाषण पढ़कर
सुना सकेंगे। |
|
||
|
|
(३) अध्यक्ष, सदन-नेता
के परामर्श से,
राज्यपाल के अभिभाषण
में निर्दिष्ट
विषयों की चर्चा
के लिए समय नियत
करेंगे जो साधारणतया
चार दिन होगाः परन्तु कोई
दिन राज्यपाल
के अभिभाषण पर
चर्चा के लिए नियत
होते हुए भी उस
दिन सदन में अभिभाषण
पर चर्चा आरम्भ
होने या जारी होने
के पूर्व अन्य
औपचारिक कार्य
किया जा सकेगा। |
|
||
|
व्याख्या- |
विधेयक
के पुरःस्थापन
का प्रस्ताव औपचारिक
कार्य है। |
|
||
|
|
(४) इस प्रकार नियत
दिन या दिनों में
सदन में एक सदस्य
द्वारा प्रस्तुत
तथा अन्य सदस्य
द्वारा समर्थित
धन्यवाद के प्रस्ताव
पर ऐसे अभिभाषण
में निर्दिष्ट
विषयों पर चर्चा
करने के लिए स्वतंत्र
होगा। |
|
||
|
|
(५) ऐसे धन्यवाद
के प्रस्ताव में
ऐसे रूप में संशोधन
प्रस्तुत किये
जा सकेंगे जिसे
अध्यक्ष उचित
समझें। |
|
||
|
|
(६) ऐसे प्रस्ताव
की चर्चा sपर संकल्पों
के विषय से सम्बद्ध
नियम यथोचित परिवर्तनों
सहित प्रवृत्त
होंगेः परन्तु ऐसे
प्रस्ताव या उस
पर संशोधन प्रस्तुत
करने के लिए किसी
सूचना की आवश्यकता
नहीं होगीः और कोई ऐसे
संशोधन प्रस्तुत
नहीं किये जा सकेंगे
जो मूल प्रस्ताव
के अन्त में शब्द
जोड़ने के रूप
में न हों: |
|
||
|
|
(७) प्रस्ताव, संशोधन
सहित अथवा संशोधन
रहित स्वीकृत
होने पर अध्यक्ष
द्वारा राज्यपाल
को अर्पित किया
जायेगा। |
|
||
|
|
(८) अध्यक्ष प्रस्ताव
पर राज्यपाल के
उत्तर को सभा में
पढ़कर सुनायेंगे। |
|
||
|
२०-अनुच्छेद १७५
(१) के अन्तर्गत
राज्यपाल का अभिभाषण - |
अनुच्छेद-१७५(१)के
अधीन राज्यपाल
द्वारा दिये गये
अभिभाषण में निर्दिष्ट
विषयों पर चर्चा
के लिए अध्यक्ष
समय नियत कर सकेंगे। |
अनु0 175(1) |
||
|
२१-अनुच्छेद
१७५ (२) के अन्तर्गत
राज्यपाल का सन्देश- |
जब अध्यक्ष
को सदन के लिए अनुच्छेद
१७५(२) के अन्तर्गत
राज्यपाल से सन्देश
मिले तो वह सदन
को सन्देश पढ़कर
सुनायेंगे और
सन्देश में निर्दिष्ट
विषयों पर विचार
करने के लिए अनुसरणीय
प्रक्रिया के
संबंध में आवश्यक
निर्देश देंगे।
ऐसे निर्देश देने
में अध्यक्ष को
उस सीमा तक नियमों
को निलम्बित या
परिवर्तित करने की
शक्ति होगी जिस
सीमा तक कि आवश्यक
हो। |
अनु0 175(2) |
||
|
अध्याय
6 |
||||
|
२२-सदन
में लिये जाने
वाले कार्य की
सूचना- |
सभा के किसी
अधिवेशन के प्रारम्भिक
सप्ताह में लिये
जाने वाले कार्य
की सूचना विधान
सभा सचिवालय को
अधिवेशन प्रारम्भ
होने के कम से कम
१५ दिन पूर्व शासन
द्वारा दी जायेगी
और तदुपरान्त
प्रत्येक सप्ताह
के अन्तिम कार्य-दिवस
पर सदन के नेता
अथवा मंत्रि परिषद्
के कोई सदस्य प्रश्नों
के उपरान्त सदन
को आगामी सप्ताह
में किये जाने
वाले कार्य की
सूचना देंगे। |
|
||
|
२२-क-
कार्य सूची- |
(१)
प्रमुख
सचिव प्रत्येक
दिन के कार्य की
एक सूची तैयार
करेंगे और उसकी
एक प्रतिलिपि
प्रत्येक सदस्य
के प्रयोग के लिये
उपलब्ध की जायेगी। (२)
जब तक कि
इन नियमों में
अन्यथा उपबन्ध
न हो अध्यक्ष की
अनुज्ञा के बिना
किसी उपवेशन में
कोई ऐसा कार्य
न लिया जायेगा
जो उस दिन की सूची
में सम्मिलित
न हो। (३) जब तक
कि अध्यक्ष अन्यथा
निर्देश न करें
ऐसा कोई कार्य
जिसके लिये सूचना
की आवश्यकता हो,
अपेक्षित सूचना
की अवधि पूरी होने
से पहले साधारणतया
किसी दिन की कार्य-सूची
में नहीं रखा जायेगा। |
|
||
|
२३-असरकारी
सदस्यों के कार्य के
लिये समय नियतन- |
(1) प्रत्येक
शुक्रवार को दो
बजे अपराहन से
पांच बजे अपराहन
तक असरकारी सदस्यों
का कार्य लिया
जायेगा और जब तक
कि अध्यक्ष अन्यथा
निर्देश न दें
उसको सरकारी कार्य
पर अग्रेता प्राप्त
होगी। (2) जब अध्यक्ष
ने उप नियम (१) के
अन्तर्गत पूर्वोक्त
रीति से अन्यथा
निदेश दिया हो
तो वह सदन नेता
से परामर्श करके
असकारी सदस्यों
के कार्य के लिये
किसी सप्ताह में
कोई अन्य दिन नियत
कर सकेंगे। |
|
||
|
२४-सरकारी
कार्य का क्रम- |
असरकारी
सदस्यों के कार्य
के लिए नियत दिनों
को छोड़कर अन्य
दिनों में अध्यक्ष
की सम्मति के बिना
सरकारी कार्य
के अतिरिक्त कोई
अन्य कार्य नहीं
लिया जायेगा।
प्रमुख सचिव उस
कार्य का विन्यास
ऐसे क्रम में करेंगे
जैसा कि अध्यक्ष
सदन नेता के परामर्श
से विनिश्चित
करेः परन्तु
अध्यक्ष सदन-नेता
के परामर्श से
कार्य के क्रम
में परिवर्तन
अथवा संशोधन कर
सकेंगे। |
|
||
|
२५-दिन
के अन्त में असरकारी
सदस्यों का अवशिष्ट
कार्य- |
असरकारी
सदस्यों का वह
कार्य जो उसके
लिये नियत किये
गये दिन के लिये
रखा गया हो और उस
दिन न लिया गया
हो, किसी आगामी
दिन के लिये तब
तक नहीं रखा जायेगा
जब तक कि दूसरी
तत्सम्बन्धी
सूचना पर उसे उस
दिन के संबंध में
की गयी शलाका में
प्राथमिकता प्राप्त
न हो गयी होः परन्तु जो कार्य
उस दिवस के अन्त
में चर्चाधीन
हो, वह असरकारी
कार्य के लिये
नियत आगामी दिन
के लिये रखा जायेगा
और उसे उस दिन के
लिये रखे गये अन्य
समस्त कार्यो
पर अग्रेता मिलेगी। |
|
||
|
अध्याय
7 |
||||
|
२६-
प्रश्नों का विषय- |
प्रश्न प्रशासन
के ऐसे विषय से
सम्बद्ध होना
चाहिए जिसके लिये
शासन उत्तरदायी
है। उसका प्रयोजन
लोक-महत्व के विषय
में सूचना प्राप्त
करना अथवा कार्यवाही
का सुझाव देना
होगा। |
|
||
|
२७-
प्रश्नों का वर्गीकरण- |
प्रश्नों
का वर्गीकरण निम्न
प्रकार से होगाः- (क) अल्पसूचित
प्रश्न, (ख) तारांकित
प्रश्न तथा (ग) अतारांकित
प्रश्न। |
|
||
|
व्याख्या |
(१)
अल्पसूचित
प्रश्न का तात्पर्य
ऐसे प्रश्न से
है जो अविलम्बनीय
लोक-महत्व के विषय
से सम्बन्धित
हो। इसका विभेद
दो तारांक लगाकर
किया जायेगा।
दिये हुये उत्तर
से उत्पन्न अनुपूरक
प्रश्न उसके बारे
में अध्यक्ष की
अनुज्ञा से किये
जा सकेंगे। |
|
||
|
व्याख्या |
(२)
ताराकिंत
प्रश्न का तात्पर्य
ऐसे प्रश्न से
है जिस पर दिये
हुये उत्तर से
उत्पन्न अनुपूरक
प्रश्न अध्यक्ष
की अनुज्ञा से
किये जा सकेंगे।
एक तारांक लगाकर
उसका विभेद किया
जायेगा। |
|
||
|
व्याख्या |
(३)
अतारांकित
प्रश्न से उस प्रश्न
का तात्पर्य है
जिसका लिखित उत्तर
संबंधित सदस्य
को दिया जाये और
जिस पर अनुपूरक
प्रश्न करने की
अनुज्ञा न हो। |
|
||
|
२८-
प्रश्नों का रूप
तथा विषय- |
कोई ऐसा
प्रश्न नहीं पूछा
जा सकेगा जो निम्नलिखित
शर्तों को पूरा
न करता हो अर्थात्:- |
|
||
|
|
(१)
उसमें
कोई ऐसा नाम या
कथन नहीं होगा
जो प्रश्न को सुबोध
बनाने के लिये
सर्वथा आवश्यक
न हो, (२)
यदि उसमें
सदस्य द्वारा
कोई कथन दिया गया
हो तो प्रश्नकर्ता
सदस्य को उस विवरण
की परिशुद्धता
के लिये स्वयं
उत्तरदायी होना
पड़ेगा, (३) वह अत्यधिक
लम्बा न होगा तथा
उसमें प्रतर्क,
अनुमान, व्यंग्यात्मक
या अपेक्षात्मक
पद अथवा मान-हानिकारक
कथन नहीं होंगे, (४) वह राय
प्रकट करने या
विधि सम्बन्धी
प्रश्न या किसी
काल्पनिक प्रस्थापन
के समाधान के लिये
नहीं पूछा जायेगा, (५)
उसमें किसी
व्यक्ति के सरकारी
अथवा सार्वजनिक
पद के अतिरिक्त
उसके चरित्र या
आचरण का उल्लेख
नहीं होगा तथा
व्यक्तिगत प्रकरणों
का निर्देश भी
न होगा जब तक कि
कोई सिद्धान्त
का विषय अन्तर्निहित
न हो, (६)
उसमें ऐसे
प्रश्नों की तत्वतः
पुनरावृत्ति
नहीं की जायेगी
जिनके उत्तर उसी
सत्र में पहले
दिये जा चुके हों
या जिनका उत्तर
देने से इन्कार
कर दिया गया हो, (७)
उसमें ऐसी
सूचना नहीं मांगी
जायेगी जो प्राप्त
दस्तावेजों अथवा
सामान्य निर्देश
ग्रन्थों में
उपलब्ध हो, (८)
उसमें किसी
ऐसे विषय के संबंध
में सूचना नहीं
मांगी जायेगी
जो भारत के किसी
भाग में क्षेत्राधिकार
रखने वाले किसी
न्यायालय के विचाराधीन
हो, (९)
उसमें किसी
न्यायाधीश या
न्यायालय के, जिसको
भारत के किसी भाग
में क्षेत्राधिकार
हो, आचरण के विषय
में किसी ऐसी बात
का निर्देश नहीं
होगा, जो उसके न्यायिक
कृत्यों से सम्बद्ध
हो, (१०)
उसमें व्यक्तिगत
रूप का दोषारोपण
नहीं किया जायेगा
और न वह दोषारोपण
ध्वनित होगा, (११)
उसमें सीमित
महत्व का अस्पष्ट
अथवा निरर्थक
विषयों पर अथवा
बहुत ब्योरे की
जानकारी नहीं
मांगी जायेगी, (१२)
उसका स्थानीय
निकायों अथवा,
अन्य अर्ध-स्वायत्त
निकायों के दैनिक
प्रशासन से कोई
संबंध नहीं होगा।
किन्तु अध्यक्ष
ऐसों प्रश्नों
को स्वीकृत कर
सकेंगे जो उनके
और शासन के संबंध
में उत्पन्न होते
हों या जो विधि
या नियमों के भंग
होने से सम्बद्ध
हों या सार्वजनिक
हित के महत्वपूर्ण
विषयों से सम्बन्ध
रखते हों, (१३)
उसमें वर्तमान
सत्र में हुए वाद-विवाद
का निर्देश नहीं
होगा, (१४)
वह किसी सदन
के विनिश्चयों
की आलोचना न करेगा, (१५)
उसमें ऐसे
विषयों के संबंध
में सूचना नहीं
मांगी जायेगी,
जो गोपनीय प्रकृति
के हों, जैसे मंत्रि-परिषद्
के विनिश्चय अथवा
कार्यवाहियां,विधि
अधिकारियों द्वारा
राज्यपाल को दी
गयी मंत्रणा तथा
अन्य तत्सम विषय, (१६)
वह किसी समिति
के समक्ष विषयों
से अथवा समिति
के सभापति अथवा
सदन के प्राधिकारियों
के क्षेत्राधिकार
के अन्तर्गत विषयों
से सम्बद्ध नहीं
होगा, (१७)
उसका सम्बन्ध
किसी असरकारी
व्यक्ति अथवा
असरकारी निकाय
द्वारा दिये गये
किसी वक्तव्य
से न होगा, (१८)
उसमें उन व्यक्तियों
के चरित्र अथवा
आचरण पर आक्षेप
नहीं होगा जिनके
आचरण पर मूल प्रस्ताव
के द्वारा ही आपत्ति
की जा सकती हो, (१९)
उसमें ऐसी
नीति के, जो इतनी
विस्तीर्ण हो
कि वह प्रश्न के
उत्तर की परिधि
के भीतर न आ सके,
प्रश्न नहीं उठाये
जायेंगे, (२०) उसमें
ऐसे विषयों के
बारे में नहीं
पूछा जायेगा जो
कोई न्यायिक या
अर्धन्य़ाय़िक
कृत्य करने वाले
किसी संविहित
न्यायाधिकरण
या संविहित प्राधिकारी
के या किसी विषय
की जांच या अनुसंधान
करने के लिये नियुक्त
किसी आयोग या जांच
न्यायालय के सामने
विचाराधीन होः किन्तु यदि
उससे न्यायाधिकरण,
संविहित प्राधिकारी,
आयोग या जांच न्यायालय
द्वारा उस विषय
के विचार किये
जाने पर प्रतिकूल
प्रभाव पड़ने
की आशंका न हो तो
उसमें जांच की
प्रक्रिया या
व्याप्ति या प्रक्रम
से संबंधित विषयों
की ओर निर्देश
किया जा सकेगा। |
|
||
|
२९- अल्पसूचित
प्रश्न- |
(१)
जब कोई
सदस्य अल्पसूचित
प्रश्न पूछना
चाहें तो वे सत्र
आहूत हो जाने के
बाद ऐसे प्रश्नों
की लिखित सूचना
न्यूनतम तीन दिन
पूर्व प्रमुख
सचिव को देंगे
और प्रमुख सचिव
साधारणतया प्रश्न
को अल्पसूचित
प्रश्न के रूप
में ग्राह्यता
पर उसकी प्राप्ति
के यथासंभव 24 घण्टे
के भीतर अध्यक्ष
की आज्ञा प्राप्त
करेंगे। (२)
अध्यक्ष
की आज्ञा प्राप्त
हो जाने के उपरान्त
प्रश्न की एक प्रतिलिपि
संबंधित मंत्री
को इस निवेदन के
साथ भेज दी जायेगी
कि वह प्रमुख सचिव
को सूचित करें
कि क्या वह प्रश्न
का उत्तर अल्पसूचित
प्रश्न के रूप
में देने की स्थिति
में है। (३) यदि मंत्री
अल्पसूचना पर
उत्तर देने के
लिये सहमत हों
तो वह तत्काल या
तदुपरान्त इतने
शीध्र कार्य-सूची
में रख दिया जायेगा
जैसा कि अध्यक्ष
निर्देश देः परन्तु किसी
एक दिन की कार्य-सूची
में २ से अधिक अल्पसूचित
प्रश्न नहीं रखे
जायेंगे। (४)
(४) यदि सम्बद्ध
मंत्री अल्पसूचना
पर उत्तर देने
की स्थिति में
न हो और अध्यक्ष
की यह राय हो कि
वह पर्याप्त लोक
महत्व का है तो
वे निर्देश दे
सकेंगे कि उसको
उस दिन की प्रश्न
सूची में प्राथमिकता
देकर पृथक नत्थी
के रूप में रखा
जाये जिस दिन नियम
के अनुसार तारांकित
प्रश्न रूप में
उत्तर के लिये
उसकी बारी हैः- परन्तु
ऐसे प्रथामिकता
प्राप्त प्रश्नों
की संख्या उस दिन
की कार्य सूची
में तीन से अधिक
न होगी और एक सदस्य
का एक से अधिक प्रश्न
नहीं रखा जायेगा। (५)
जब दो या दो
से अधिक सदस्य
एक ही विषय पर अल्पसूचित
प्रश्न दें और
एक सदस्य का प्रश्न
अल्पसूचना पर
उत्तर के लिये
हो जाये, तो अन्य
सदस्यों के नाम
भी उस सदस्य के
नाम के साथ रख दिये
जायेंगे, जिसका
प्रश्न उत्तर
के लिये ग्राह्य कर
लिया गया होः- परन्तु अध्यक्ष
यह निर्देश दे
सकेंगे कि सब सूचनाओं
को एक ही सूचना
में समेकित कर
दिया जाय यदि उनकी
राय में एक ही स्वयं
पूर्ण ऐसा प्रश्न
तैयार करना वांछनीय
हो, जिनमें सदस्यों
द्वारा बताई गयी
सब महत्वपूर्ण
बातें आ जायें
और तब मंत्री उसमें
समेकित प्रश्न
का उत्तर देंगेः किन्तु समेकित
प्रश्न की अवस्था
में सभी संबंधित
सदस्यों के नाम
साथ-साथ दिये जा
सकेंगे और उनकी
सूचना की प्राथमिकता
के क्रम से प्रश्न
के सामने दिखाये
जा सकेंगे। |
|
||
|
३०-तारांकित
तथा अतारांकित
प्रश्नों की सूचना- |
(1)
तारांकित
और अतारांकित
प्रश्नों की लिखित
सूचना सदस्य द्वारा
प्रमुख सचिव को
कम से कम पूरे २०
दिन पूर्व दी जायेगी। (2)
ऐसे प्रश्न
प्रमुख सचिव द्वारा
शासन को साधारणता
५ दिन के भीतर भेज
दिये जायेंगेः परन्तु जब
तक अध्यक्ष अन्यथा
विनिश्चय न करें
कोई प्रश्न उत्तर
के लिये प्रश्न-सूची
में तब तक नहीं
रखा जायेगा जब
तक कि मंत्री या
संबंधित विभाग
को ऐसे प्रश्न
की सूचना देने
के दिनांक से १५
दिन समाप्त न हो
जायः परन्तु यह
भी कि यदि अध्यक्ष
की यह राय हो कि
प्रश्न की ग्राह्यता
अथवा अग्राह्यता
का विनिश्चय करने
के लिये अधिक समय
की आवश्यकता है
तो वह प्रश्न उत्तर
के लिये कार्य-सूची
में उस दिन के बाद
किसी दिन रखा जायेगा
जिस दिन वह नियमों
के अधीन नियत किया
जाता। (3) नियम
२९ के उप नियम (५)
के उपबन्ध तारांकित
तथा अतारांकित
प्रश्नों की सूचनाओं
की दशा में भी प्रवृत्त
होंगे। |
|
||
|
३१-प्रश्नों
के लिये समय- |
जब तक
अध्यक्ष अन्यथा
निर्देश न दें,प्रत्येक
उपवेशन का पहला
एक घण्टा और बीस
मिनट का समय प्रश्नों
के पूछने और उनका
उत्तर देने के
लिये उपलब्ध रहेगा
जिसमें:- (1)
सवर्प्रथम
अल्पसूचित प्रश्न
लिये जायेंगे, (2) तदुपरान्त
नियम २९ (४) के अन्तर्गत
प्राथमिकता प्राप्त
प्रश्न लिये जायेंगे, (3)
तदुपरान्त
तारांकित प्रश्न
लिये जायेंगे
तथा (4)
अन्त में
अतारांकित प्रश्न
लिये गये समझे
जायेंगे। |
|
||
|
३२-उत्तरों
की प्रतियां सदस्य
को उपलब्ध करना
तथा सदन में प्रश्नोत्तर
का निस्तारण- |
(१)
प्रश्नों
के उत्तर के लिये
जो दिन नियत किया
गया हो, उस दिन का
उपवेशन आरम्भ
होने के एक दिन
पूर्व प्रश्न
के लिखित उत्तरों
की प्रति सम्बद्ध
सदस्य को उपलब्ध
कर दी जायेगी। (२)
अल्पसूचित
प्रश्नों और तारांकित
प्रश्नों के उत्तर
सम्बद्ध मंत्री
द्वारा पढ़कर
सुनाये जायेंगे
तथा कार्य-सूची
में सम्मिलित
ऐसे समस्त अतारांकित
प्रश्नों के, जो स्थगित
न किये गये हों,
उत्तरों को सभा
पटल पर रखा गया
समझा जायेगा और
ऐसे अतारांकित
प्रश्न तथा उनके
लिखित उत्तर उस
दिन की कार्यवाही
के अंश के रूप में
प्रकाशित किये
जायेंगे। |
|
||
|
३३-प्रश्नों
की संख्या की परिसीमा- |
(१) एक सदस्य
एक दिन में केवल
पांच प्रश्नों
की ही सूचना दे
सकेगा जिसमें
अल्पसूचित तारांकित
प्रश्न, तारांकित
प्रश्न तथा अतारांकित
प्रश्न सम्मिलित
हैं। यदि कोई सदस्य
पांच प्रश्नों
से अधिक सूचना
किसी दिन देता
है तो उसकी प्रथम
पांच सूचनाएं
ली जा सकेंगी और
शेष सूचना अस्वीकृत
समझी जायेंगी। (२) मौखिक
उत्तर के लिये
किसी एक दिन की
प्रश्न सूची में
तारांक लगाकर
विभेद किये गये
२० से अधिक प्रश्न
नहीं रखे जायेंगे
तथा एक सदस्य का
एक से अधिक तारांकित
प्रश्न नहीं रखा
जायेगा। सदस्यों
के किसी एक दिन
के लिए निर्धारित
एक से अधिक तारांकित
प्रश्न अतारांकित
प्रश्नों की सूची
में रख दिये जायेंगेः परन्तु
किसी एक दिन के
लिए निर्धारित
अतारांकित प्रश्नों
की कुल संख्या
सामान्यतया २००
से अधिक न होगी। |
|
||
|
३४-
प्रश्नों के मौखिक
उत्तरों के लिए
दिन नियत करना- |
प्रश्नों के
उत्तर देने के
लिए उपलब्ध समय
सम्बद्ध मंत्री
अथवा मंत्रियों
से सम्बद्ध प्रश्नों
के उत्तर देने
के लिए भिन्न-भिन्न
दिनों में चक्रानुक्रम
से उस प्रकार नियत
किया जायेगा जैसा
कि अध्यक्ष समय-समय पर उपबन्धित
करें। प्रत्येक
ऐसे दिन जब तक अध्यक्ष
सम्बद्ध मंत्री
की सम्मति से अन्यथा
निर्देश न दें, केवल ऐसे मंत्री
अथवा मंत्रियों
से सम्बद्ध प्रश्न
ही, जिनके
लिये उस दिन समय
नियत किया गया
हो, उत्तर
के लिए प्रश्न- सूची में रखे
जायेंगे। यह नियम
अल्पसूचित प्रश्नों
के सम्बन्ध में
प्रवृत्त न होगा। |
|
||
|
३५-
मंत्री की अनुपस्थिति
के कारण प्रश्न
का स्थगन- |
विशेष अथवा
अप्रत्याशित
परिस्थितियों
के कारण सम्बद्ध
मंत्री की अनुपस्थिति
की दशा में तदविषयक प्रार्थना
किये जाने पर अध्यक्ष
प्रश्न को किसी
आगामी दिन के लिये
स्थगित कर सकेंगे। |
|
||
|
३६-
प्रश्न पूछने
की रीति- |
प्रश्नों के
घंटे में अध्यक्ष
उन सदस्यों को
जिनके नाम में
प्रश्न सूची-बद्ध
किये गये हों क्रमानुसार
तथा प्रश्नों
की प्राथमिकता
का यथोचित ध्यान
रखते हुए अथवा
ऐसी अन्य रीति
से पुकारेंगे
जिसको अध्यक्ष
स्वविवेक से विनिश्चित
करें और ऐसे सदस्य
पुकारे जाने पर
अपनी उपस्थित
दर्शाने
के लिए अपने स्थान
पर खड़े होंगे।
यदि वह सदस्य जो
पुकारे गये हों
अनुपस्थित हों
तो अध्यक्ष आगामी
प्रश्न को ले लेंगे। |
|
||
|
३७-
प्रश्नों की सूचना
देने की रीति- |
प्रश्न
विभागीय मंत्री
को सम्बोधित होंगे
और प्रमुख सचिव
को उनकी लिखित
सूचना दी जायेगी। व्याख्या- एक दिन प्राप्त
हुए प्रश्न उसी
दिन के समझे जायेंगे,
चाहे प्रश्नकर्ता
ने उस पर विभिन्न
दिनांक अंकित
कर दिये हों। |
|
||
|
३८-
प्रश्नों के उत्तर
देने के ढंग- |
(१)
प्रश्नों
के उत्तर प्रश्नों
के विषय से सुसंगत
होंगे और अध्यक्ष
यह विनिश्चित
करें तो वे सभा
के पटल पर विवरण
रखने के रूप में
हो सकेंगे। (२)
किसी प्रश्न
का उत्तर उस तिथि
को दिया जायेगा
जिसके लिए वह सूची-बद्ध
किया गया हो। यदि
सदस्य द्वारा
अपेक्षित सूचना
उपलब्ध न हो तो
मंत्री तदनुसार
स्थिति बतायेंगे
और अध्यक्ष इतना
अधिक समय, जिसे
वे परिस्थितियों
को देखते हुए उपयुक्त
समझें दे सकेंगे
तथा उत्तर के लिए
कोई तिथि नियत
करेंगे। (३) यदि मंत्री
की यह राय हो कि
सदस्य द्वारा
अपेक्षित सूचना
लोक-हित में नहीं
दी जा सकती तो वे
ऐसा कहेंगे। इस
आधार पर मंत्री
की सूचना देने
से इन्कार करना
विशेषाधिकार
का विषय नहीं बनाया
जा सकता और न इस
आधार पर सदन के
स्थगन का प्रस्ताव
ही लाया जा सकता
है। |
|
||
|
३९-
अनुपस्थित सदस्यों
के प्रश्न- |
जब समस्त प्रश्न
जिनका मौखिक उत्तर
अभिप्रेत है, पुकारे
जा चुके हैं, तब
अध्यक्ष, यदि समय
हो, किसी प्रश्न
को पुनः पुकार
सकेंगे जो उस सदस्य
की अनुपस्थिति
के कारण न पूछा
गया हो जिसके नाम
में वह प्रश्न
हो तथा अध्यक्ष
किसी सदस्य को
अन्य किसी सदस्य
के नाम में रखे
हुए प्रश्न को
पूछने की अनुज्ञा
दे सकेंगे यदि
वे उनके द्वारा
इस प्रकार प्राधिकृत
किये गये हों या
यदि अन्य कोई सदस्य
उस प्रश्न में
अभिरुचि रखते
हों। |
|
||
|
४०-
प्रश्नों की वापसी
अथवा उसका स्थगन- |
कोई भी सदस्य
उस उपवेशन के पूर्व
जिसके लिए उनका
प्रश्न सूची-बद्ध
किया गया हो, सूचना
देकर अध्यक्ष
की सहमति से किसी
भी समय अपने प्रश्न
को वापस ले सकेंगे
अथवा सूचना में
निर्दिष्ट किसी
आगामी दिन के लिए
उसको स्थगित करने
की प्रार्थना
कर सकेंगे और नियम
३४ के उपबन्धों
के अधीन ऐसे आगामी
दिन के लिए रखा
गया प्रश्न उस
दिन के निर्दिष्ट
प्रश्नों की सूची
के अन्त में रखा
जायेगा। |
|
||
|
४१-मौखिक
उत्तर न दिये जाने
वाले प्रश्नों
का लिखित उत्तर- |
यदि उत्तर के
लिए किसी तिथि
को निर्धारित
कोई अल्पसूचित
अथवा तारांकित
प्रश्न किसी कारण
से उक्त तिथि को
सदन में न लिया
जा सके तो उसका
उत्तर दिया हुआ
माना जायेगा और
ऐसे समस्त प्रश्नों
के लिखित उत्तर
उस दिन की कार्यवाही
के अंश के रूप में
प्रकाशित किये
जायेंगे। |
|
||
|
४२-
अनुपूरक प्रश्न- |
(१) नियम
३१ के अन्तर्गत
प्रश्नों के समय
में किसी प्रश्न
अथवा उत्तर के
संबंध में चर्चा
करने की अनुज्ञा
नहीं होगी। (२) अध्यक्ष
की अनुज्ञा से
सदस्य प्रश्नाधीन
विषय संबंधी तथ्यों
पर अग्रेतर स्पष्टीकरण
हेतु अनुपूरक
प्रश्न पूछ सकेंगेः परन्तु
अध्यक्ष कोई ऐसा
अनुपूरक प्रश्न
अस्वीकार करेंगे,
यदि उनकी राय में
उससे प्रश्नों
संबंधी नियम भंग
होते हैं। |
|
||
|
४३-
अध्यक्ष से प्रश्न- |
अध्यक्ष से
प्रश्न व्यक्तिगत
सूचना द्वारा
किये जायेंगे।
ऐसे प्रश्नों
का उत्तर लिखित
रूप से अथवा अध्यक्ष
के निजी कमरे में
दिया जा सकेगा। |
|
||
|
४४-
असरकारी सदस्यों
से प्रश्न- |
प्रश्न एक सदस्य
द्वारा किसी दूसरे
असरकारी सदस्य
को संबोधित किया
जा सकेगा यदि प्रश्न
का विषय किसी विधेयक,
संकल्प अथवा सदन
के कार्य के अन्य
विषय से सम्बद्ध
हो जिसके लिए वे
सदस्य उत्तरदायी
हैं और ऐसे प्रश्नों
के संबंध में यथा
सम्भव उसी प्रक्रिया
का, जो किसी मंत्री
से पूछे गये प्रश्नों
के संबंध में प्रयोग
की जाती है,ऐसे
परिवर्तनों के
साथ अनुसरण किया
जायेगा जिन्हें
अध्यक्ष आवश्यक
अथवा सुविधाजनक
समझें। |
|
||
|
४५-
अध्यक्ष प्रश्नों
की ग्राह्यता
का विनिश्चय करेंगे- |
अध्यक्ष प्रश्न
की ग्राह्यता
का विनिश्चय करेंगे
और वे किसी प्रश्न
को अथवा उसके किसी
भाग को अस्वीकार
कर सकेंगे जो उनकी
राय में इन नियमों
के प्रतिकूल है
अथवा प्रश्न पूछने
के अधिकार का दुरुपयोग
है। अध्यक्ष सम्बद्ध
सदस्य को संक्षेप
में प्रश्न को
अग्राह्य करने
के कारणों की सूचना
देंगे। वे किसी
प्रश्न को नियमानुकूल
बनाने के लिए उसमें
संशोधन कर सकेंगे
अथवा प्रश्न को
सुधार के निमित्त
वापस कर सकेंगे। |
|
||
|
४६-
प्रश्न के वर्ग में परिवर्तन
करने की अध्यक्ष
की शक्ति- |
अध्यक्ष
किसी अल्पसूचित
प्रश्न को तारांकित
या अतारांकित
प्रश्न में तथा
किसी तारांकित
प्रश्न को अतारांकित
प्रश्न में परिवर्तित
कर सकेंगेः परन्तु
अध्यक्ष यदि उचित
समझें तो तारांकित
प्रश्न की सूचना
देने वाले सदस्य
से अपने प्रश्न
को इस वर्ग में रखने
का कारण संक्षिप्त
रूप से बताने के
लिए कह सकेंगे
और उस पर विचार
करने के उपरान्त
अध्यक्ष निर्देश
दे सकेंगे कि प्रश्न
को उस वर्ग में
रखा जाय। |
|
||
|
४७-
किसी दिन के लिए
प्रश्नों की सूची- |
(१) अध्यक्ष
द्वारा ग्राह्य
प्रश्नों में
से प्राप्ति के
क्रमानुसार प्रथम
२० सदस्यों के
एक-एक तारांकित
प्रश्न निर्धारित
दिन के प्रश्नों
की कार्य-सूची
में रखे जायेंगे
और उसी क्रम से
पुकारे जायेंगे
जिस प्रकार वे
सूची में दिये
हों। उक्त दिन
के लिए निर्धारित
शेष तारांकित
प्रश्न अतारांकित
प्रश्नों की सूची
में रख दिये जायेंगे। (२) प्रमुख सचिव
प्रत्येक कार्य
दिवस के लिए निर्धारित
प्रश्नों की एक
अस्थायी सूची
बनायेंगे तथा
उस दिनांक से साधारणतया
एक सप्ताह के पूर्व
उसकी प्रतिलिपियां
सब सदस्यों को
भेज देंगे। यदि
उस दिन सदन का उपवेशन
हो रहा हो तो वह
सदस्यों को प्रतिलिपियां
भेजने के बदले
उन्हें सदस्यों
की मेजों पर रखेंगे। |
|
||
|
४८-प्रश्नोत्तरों
का सभा की कार्यवाहियों
में समावेश- |
प्रश्न
जो पूछे जायं तथा
जिनके उत्तर दिये
जायं उन सबका सभा
की कार्यवाही
में समावेश होगाः परन्तु
किसी प्रश्न को
जो अस्वीकार किया
गया हो इस प्रकार
समावेश नहीं हो
सकेगा। |
|
||
|
४९-प्रश्नोत्तरों
से उत्पन्न होने
वाले विषयों पर
चर्चा- |
(१) अध्यक्ष
किसी ऐसे पर्याप्त
लोक महत्व के विषय
पर जो सदन में हाल
में प्रश्ननोत्तर
का विषय रहा हो,
चर्चा करने
के लिए आधे घण्टे
का समय नियत कर
सकेंगे। (२)
जब तक अध्यक्ष
अन्यथा निर्देश
न दें यह नियतन
साधारणतया सदन
के उपवेशन के दौरान
किसी मंगलवार
या बृहस्पतिवार
के लिए सामान्य
कार्य की समाप्ति
के उपरान्त किया
जायेगा। (३) कोई
सदस्य जो ऐसा विषय
उठाना चाहते हों,
उस दिन से, जिस दिन
वे उस विषय को उठाना
चाहते हों, तीन
दिन पूर्व प्रमुख
सचिव को उसकी लिखित
सूचना भेजेंगे
और इस विषय या उन
विषयों का, जिनको
वे उठाना चाहते
हों, संक्षेप में
उल्लेख करेंगेः परन्तु सूचना
के साथ व्याख्यात्मक
टिप्पणी होगी
जिसमें सम्बद्ध
विषयों पर चर्चा
उठाने के कारण
बताये जायेंगेः किन्तु अध्यक्ष
सम्बद्ध मंत्री
की सम्मत्ति से
सूचना की अवधि
संबंधी अपेक्षा
को हटा सकेंगे। (४) यदि
आवश्यक हो तो एक
ही उपवेशन में
दो सूचनायें ली
जा सकेंगी। यदि
दो से अधिक सूचनायें
प्राप्त हुई हों
और अध्यक्ष ने
उनको स्वीकार
कर लिया हो तो अध्यक्ष
यह विनिश्चित
करेंगे कि उनमें
से कौन सी दो ली
जायं: परन्तु यदि
कोई विषय जो किसी
विशेष दिन के लिए
चर्चार्थ रखा
गया हो यदि उस दिन
निस्तीर्ण न हो
सके तो वह अन्य
किसी दिन तब तक
नहीं रखा जायेगा
जब तक कि अध्यक्ष
अन्यथा निर्देश
न दें। (५) सदन के समक्ष
कोई औपचारिक प्रस्ताव
न होगा और न मत लिए
जायेंगे। जिस
सदस्य ने सूचना
दी हो वह एक संक्षिप्त
वक्तव्य द्वारा
उस विषय का पुरःस्थापन
करेंगे। सम्बद्ध
मंत्री संक्षेप
में उत्तर देंगे।
तत्पश्चात् अध्यक्ष
अन्य सदस्यों
को किसी तथ्य विषय
के अतिरिक्त स्पष्टीकरण
के प्रयोजन से
प्रश्न पूछने
की अनुज्ञा दे
सकेंगे। विषय
पुरःस्थापित
करने वाले सदस्य
को उत्तर देने
के लिए दूसरी बार
बोलने की अनुज्ञा
दी जा सकेगी और
सम्बद्ध मंत्री
के अन्तिम कथन
होने पर चर्चा समाप्त हो
जायेगी। |
|
||
|
५०-
प्रश्नों और उत्तरों
के पूर्व
प्रकाशन का प्रतिषेध- |
प्रश्न
जिनकी सदस्यों
ने सूचना दी हो,
और उनके उत्तर
जो मंत्री सदन
में देना चाहते
हों, तब तक प्रकाशनार्थ
नहीं दिये जायेंगे
जब तक कि सदन में
प्रश्न न ले लिये
जायं और उनके उत्तर
न दे दिये जायं
या पटल पर न रख दिये
जायं। |
|
||
|
अध्याय
8 |
||||
|
५१-
अविलम्बनीय लोक
महत्व के विषयों
पर ध्यान दिलाना- |
(१)
कोई
सदस्य अविलम्बनीय
लोक महत्व के विषय
पर मंत्री का ध्यान
आकृष्ट करने की
सूचना प्रमुख
सचिव को उपवेशन
प्रारम्भ होने
के एक घण्टा पूर्व
दे सकेंगे। ऐसी
सूचना द्वि-प्रतिक
होगी। प्रमुख
सचिव सूचना की
एक प्रति सम्बद्ध
मंत्री को सूचनार्थ भेज देंगे। (२)
किसी ऐसी
सूचना के स्वीकृत
हो जाने पर सम्बद्ध
मंत्री सूचनांकित
विषय पर उसी दिन
अपना संक्षिप्त
वक्तव्य देंगे
या भावी तिथि पर
वक्तव्य देने
के लिये समय मांग
सकेंगे। लिखित
वक्तव्य होने
की दशा में उसकी
एक प्रति सम्बद्ध
सदस्य को भी दी
जायेगी। (३) ऐसे वक्तव्य
पर कोई वाद-विवाद
नहीं होगा परन्तु
अध्यक्ष यदि उचित
समझें तो सूचनांकित
विषय संबंधी तथ्यों
के स्पष्टीकरण
के लिये प्रश्नों
की अनुमति दे सकेंगे। (४) एक ही
उपवेशन में एक
से अधिक ऐसे विषय
नहीं उठाये जायेंगे। (५) एक ही
दिन के लिए एक से
अधिक सूचनायें
प्राप्त होने
की दशा में उस सूचना
को स्वीकार किया
जायेगा जिसका
विषय अध्यक्ष
की राय में सर्वाधिक
अविलम्बनीय और
महत्वपूर्ण हो। |
|
||
|
अध्याय ९ |
||||
|
५२-
चर्चा उठाने
की सूचना- |
अविलम्बनीय
लोक महत्व के विषय
पर चर्चा उठाने
के इच्छुक कोई
सदस्य उठाये जाने
वाले विषय का स्पष्टतया
तथा सुतथ्यतया
उल्लेख कर प्रमुख
सचिव को लिखित
रूप में सूचना
दे सकेंगेः परन्तु सूचना
के साथ एक व्याख्यात्मक
टिप्पणी संलग्न
होगी जिसमें विषय
की चर्चा उठाने
के कारण दिये जायेंगेः और
सूचना का समर्थन
कम से कम दो अन्य
सदस्यों के हस्ताक्षर
से होगा। |
|
||
|
५३-
अध्यक्ष ग्राह्यता
का विनिश्चय करेंगे- |
यदि अध्यक्ष
का सूचना देने
वाले सदस्य से
और मंत्री से ऐसी
जानकारी के मांगने
के बाद जिसे वे
आवश्यक समझें,
समाधान हो जाये
कि विषय अविलम्बनीय
है तथा इतने महत्व
का है कि सदन में
किसी दिन शीघ्र
ही उठाया जाना
चाहिये तो वे सूचना
गृहण कर सकेंगे
और सदन नेता के
परामर्श से उस
विषय को चर्चार्थ
लेने के लिये तिथि
व समय निश्चित
कर देंगे। वह तिथि
को तथा सूचना के
विषय को सदन में
घोषित करेंगे
और चर्चा के लिये
उतने समय की अनुमति
दें सकेंगे जितना
कि परिस्थितियों
में उचित समझें
और जो ढाई घंटे
से अधिक न होः परन्तु
ऐसे विषय पर चर्चा
के लिये इससे पूर्व
कोई अवसर अन्यथा
उपलब्ध हो तो अध्यक्ष
सूचना गृह ण करने
से इन्कार कर सकेंगे। |
|
||
|
५४-औपचारिक
प्रस्ताव नहीं
रखा जायेगा- |
सदन के सामने
न तो कोई औपचारिक
प्रस्ताव होगा
और न मतदान होगा।
जिस सदस्य ने सूचना
दी हो वे संक्षिप्त
वक्तव्य दे सकेंगे
और मंत्री संक्षेप
में उत्तर देंगे।
किसी अन्य सदस्य
को भी चर्चा में
भाग लेने की अनुमति
दी जा सकेगी। विषय
पुरःस्थापित
करने वाले सदस्य
को उत्तर देने
के लिये दूसरी
बार बोलने की अनुज्ञा
दी जा सकेगी और
सम्बद्ध मंत्री
का अंतिम कथन होने
पर चर्चा समाप्त
हो जायेगी। |
|
||
|
५५-
भाषणों के लिये
समय-सीमा- |
अध्यक्ष,
यदि वे ठीक समझें
भाषणों के लिये
समय-सीमा विहित
कर सकेंगे। |
|
||
|
अध्याय
१० अविलम्बनीय
लोक महत्व के विषय
पर कार्य-स्थगन
प्रस्ताव |
||||
|
५६-
सूचना देने की
रीति- |
जिस दिन कार्ये-स्थगन
प्रस्ताव प्रस्तुत
करना हो उस दिन
का उपवेशन आरम्भ
होने के कम से कम
एक घंटे पूर्व
उसकी द्वि-प्रतिक
सूचना प्रमुख
सचिव को दी जायेगी।
प्रमुख सचिव सूचना
की एक प्रति को
सम्बद्ध मंत्री
के पास भेज देंगे। |
|
||
|
५७-
प्रस्ताव प्रस्तुत
करने के लिये अध्यक्ष
की सम्मत्ति की
आवश्यकता- |
इन नियमों के
उपबन्धों के अधीन
किसी लोक महत्व
के निश्चित अविलम्बनीय
विषय पर चर्चा
करने के उददेश्य
से सदन के कार्य-स्थगन
का प्रस्ताव अध्यक्ष
की सम्मति से प्रस्तुत
किया जा सकेगा। |
|
||
|
५८-
प्रस्ताव प्रस्तुत
करने के अधिकार
पर निर्बन्धन- |
कार्य-स्थगन
प्रस्ताव निम्नलिखित
निर्बन्धनों
के अधीन ग्राह्य
होगा- (१) एक ही
उपवेशन में एक
से अधिक प्रस्ताव
नहीं किये जायेंगे, (२) एक ही
प्रस्ताव द्वारा
एक से अधिक विषय
पर चर्चा नहीं होगी, (३) प्रस्ताव
हाल में ही घटित
किसी निर्दिष्ट
विषय तक निर्बद्ध रहेगा, (४) प्रस्ताव
द्वारा विशेषाधिकार
का प्रश्न नहीं
उठाया जायेगा, (५) प्रस्ताव
द्वारा किसी ऐसे
विषय पर पुनः चर्चा
नहीं हो सकेगी
जिस पर उसी सत्र
में चर्चा हो चुकी
हो, (६) प्रस्ताव
में कोई ऐसा विषय
नहीं लाया जा सकेगा
जो पहले से सदन
के विचारार्थ
निर्धारित किया
जा चुका हो, किन्तु इस आधार
पर प्रस्ताव को
अग्राह्य करने
के संवंध में अध्यक्ष
इस बात को ध्यान
में रखेंगे कि
प्रत्याशित विषय
पर चर्चा उचित
समय के भीतर सदन
के समक्ष आने की
सम्भावना है, तथा (७) प्रस्ताव
का विषय ऐसा नहीं
होगा कि जिस पर
कोई संकल्प प्रस्तुत
न किया जा सके। |
|
||
|
५९-न्यायाधिकरण,
आयोग आदि के विचाराधीन
विषय पर चर्चा के लिये
प्रस्ताव- |
ऐसे प्रस्तावों
को प्रस्तुत करने
की अनुज्ञा नहीं
दी जायेगी जो किसी
ऐसे विषय पर चर्चा
उठाने के लिये
हो जो किसी न्यायिक
या अर्ध-न्य़ाय़िक कृत्य करने
वाले किसी संविहित
न्यायाधिकरण
या संविहित प्राधिकारी
के या किसी विषय
की जांच या अनुसंधान
करने के लिये नियुक्त
किसी आयोग या जांच
न्यायालय के सामने
लम्बित
हो; परन्तु
यदि अध्यक्ष का
समाधान हो जाय
कि इससे न्यायाधिकरण,
संविहित प्रधिकारी,
आयोग या जांच न्यायालय,
द्वारा उस विषय
के विचार किये
जाने पर प्रतिकूल
प्रभाव पड़ने
की आंशका नहीं
है तो अध्यक्ष
स्वविवेक से ऐसे
विषय को सदन में
उठाने की अनुमति
दे सकेंगे जो जांच
की प्रक्रिया
या व्याप्ति या
प्रक्रम से संबंधित
हो। |
|
||
|
६०-कार्य-स्थगन प्रस्ताव
प्रस्तुत करने
के लिये अनुज्ञा
मांगने की रीति- |
(१) यदि
अध्यक्ष इस विचार
के हों कि प्रस्थापित
विषय नियमानुकूल
है और नियम ५७ के
अन्तर्गत वे अपनी
सम्मति दें तो
वे सम्बद्ध सदस्य
को पुकारेंगे
जो अपने स्थान
पर खड़े होकर सदन
के स्थगित करने
का प्रस्ताव उपस्थित
करने की अनुज्ञा
मांगेंगे। (२) यदि अनुज्ञा
देने पर आपत्ति
की जाय तो अध्यक्ष
उन सदस्यों से
जो अनुज्ञा प्रदान
करने के पक्ष में
हों अपने स्थानों
पर खड़े होने की
प्रार्थना करेंगे
और यदि तदनुसार
कम से कम तात्कालिक
सदन के कुल सदस्यों
के द्वाद्शांश
सदस्य खड़े हो
जायें तो अध्यक्ष
सूचित करेंगे
कि अनुज्ञा प्रदान
की गयी। यदि अपेक्षित
संख्या से कम सदस्य
खड़े हों तो अध्यक्ष
सदस्य को सूचित
कर देंगे कि उन्हें
सदन की अनुज्ञा
प्राप्त नहीं
है। |
|
||
|
६१-प्रस्ताव
को लेने का समय- |
यदि ऐसा प्रस्ताव
प्रस्तुत करने
की अनुज्ञा प्राप्त
हो जाय तो दिन का
कार्य समाप्त
होने के लिये साधारणतया
नियत समय से एक
घंटा पूर्व या
यदि अध्यक्ष ऐसा
निर्देश दें तो
ऐसे पूर्व समय
पर जबकि दिन का
कार्य समाप्त
हो जाय उस प्रस्ताव
को लिया जायेगा। |
|
||
|
६२-
चर्चा के समय की
परिसीमा- |
(१) अविलम्बनीय
लोक महत्व के निश्चित
विषय पर विचार
करने के प्रस्ताव
पर चर्चा यदि पहले
समाप्त न हो जाय
आरम्भ होने से
दो घंटे पूरे होने
पर आप से आप समाप्त
हो जायेगी और उसके
पश्चात् कोई प्रश्न
नहीं रखा जायेगा। (२) अध्यक्ष
भाषणों के समय
को निर्धारित
करेंगे। परन्तु कोई
भाषण १५ मिनट से
अधिक अवधि का नहीं
होगा। |
|
||
|
अध्याय
११ |
||||
|
६३-
विशेषाधिकार
भंग अथवा अवमान
के प्रश्न का उठाया
जाना- |
किसी
सदस्य के, अथवा सदन के, अथवा उसकी
किसी समिति के
विशेषाधिकार
भंग अथवा अवमान
के प्रश्न को अध्यक्ष
की सम्मति से- (१) किसी
सदस्य की ओर से
शिकायत द्वारा, (२) प्रमुख
सचिव की ओर से प्रतिवेदन
द्वारा, (३) याचिका द्वारा, अथवा (4) समिति के प्रतिवेदन
द्वारा उठाया
जा सकेगाः परन्तु यदि
विशेषाधिकार
भंग अथवा अवमान
सदन के प्रत्यक्ष
ही हुआ हो तो सदन
अध्यक्ष की सम्मति
से, बिना
किसी शिकायत के
ही कार्यवाही
कर सकेगा। |
|
||
|
६४-सदस्य
द्वारा शिकायत- |
जो सदस्य
ऐसा प्रश्न उठाना
चाहें वे प्रमुख
सचिव को लिखित
सूचना देंगे।
यदि शिकायत का
आधार कोई लेख्य
हो तो मूल लेख्य
या उसकी प्रतिलिपि
सूचना के साथ संलग्न
की जायेगी। यदि शिकायत
सदन के किसी सदस्य
के विरूद्ध हो
तो ऐसी सूचना द्वि-प्रतिक होगी
जिसकी एक प्रति
सम्बन्धित सदस्य
को भेज दी जायेगी। |
|
||
|
६५-ग्राह्यता
की शर्तें- |
(१) ऐसे
प्रश्न की ग्राह्यता निम्नलिखित
शर्तो से नियंत्रित
होगी- (क) प्रश्न
किसी हाल ही में
घटित निश्चित
विषय तक निर्बद्ध
हो, (ख) सूचना
के विषय से विशेषाधिकार
भंग अथवा अवमान
का प्रश्न प्राग्दर्शन
से विदित हो, तथा (ग) ऐसे
मामले में सदन
का हस्तक्षेप
आवश्यक होः परन्तु यदि
शिकायत किसी सदस्य
के विरूद्ध हो
तो अध्यक्ष, अपनी सम्मति
तथा ग्राह्यता
सम्बन्धी अपनी
स्वीकृति देने
के पूर्व सदस्य
को, सम्बद्ध
लेख्यों, यदि कोई हो, के निरीक्षण
का अवसर देकर सुनेंगे
और आवश्यकता होने
पर शिकायतकर्ता
को भी सुन सकेंगे
। (२) एक उपवेशन
में एक से अधिक
प्रश्न नहीं उठाये
जायेंगे। |
|
||
|
६६-शिकायत
का प्रस्तुत किया
जाना- |
यदि इन
नियमों के अन्तर्गत
अध्यक्ष के मत
में विशेषाधिकार
भंग अथवा अवमान
की सूचना सम्मति
योग्य तथा ग्राह्य
हो तो वे उस मामले
को विशेषाधिकार
समिति को जांच, अनुसंधान तथा
प्रतिवेदन के
निमित्त निर्दिष्ट कर सकेंगे
और उसकी सूचना
सदन को देंगे।
अध्यक्ष के मत
में सूचना अग्राह्य
हो तो वे अस्वीकृत
की सूचना सदन को
देंगे: किन्तु
यदि अध्यक्ष आवश्यक
समझें तो अपना निर्णय
देने के पूर्व
सम्बन्धित सदस्य
तथा अन्य सदस्यों
को सुन सकेंगे। |
|
||
|
६७-विशेषाधिकार
भंग अथवा अवमान
के प्रश्न पर सदन
द्वारा विचार- |
यदि अध्यक्ष
इस मत के हों कि
सूचना का विषय
ऐसा है जो बिना
विशेषाधिकार
समिति को निर्दिष्ट
किये ही सदन में
निस्तीर्ण किया
जा सकता है तो
यह प्रस्ताव
किया जा सकेगा
कि प्रश्न पर तत्काल
या किसी आगामी
तिथि पर विचार
किया जाय: परन्तु यदि
सूचना प्रमुख
सचिव या समिति
के प्रतिवेदन
द्वारा अथवा याचिका
द्वारा प्राप्त
हुई है तो सदन में
विषय पर विचार
आरम्भ होने के
पूर्व यदि अध्यक्ष
आवश्यक समझें,
तो प्रतिवेदन
अथवा याचिका की
प्रतियां छपवा
कर सदस्यों में
वितरित की जायेंगी। |
|
||
|
६८-
सदन के समक्ष शिकायत
का निस्तारण- |
(१) यदि
सदस्य के विरूद्ध
शिकायत का सदन
में निस्तारणार्थ
लिया जाना निश्चित
हो जाय तो उक्त
सदस्य को सूचना
दी जायेगी और उनको
स्पष्टीकरण तथा
निर्दोशिता सिद्धि
के संबंध में अपना
पक्ष प्रस्तुत
करने का तथा तत्संबंधी
लेख्य या लेख्यों
के निरीक्षण करने
तथा प्रस्तुत
करने का अवसर दिया
जायेगा। (२) वे सदस्य
जिनके विरूद्ध
शिकायत की गयी
है, इस प्रकार
नियत दिन पर सदन
में उपस्थित होंगे
और यदि उपस्थित
होने में असमर्थ
हों तो वे अध्यक्ष
को अनुपस्थिति
के कारण की सूचना
देंगे और सदन, दिये गये कारण
को देखते हुए उस
विषय पर विचार
स्थगित कर सकेगा।
किन्तु यदि सदन
की राय में अनुपस्थिति का समुचित
कारण नहीं है या
वह सदस्य जान-बूझकर
अनुपस्थित रहे
तो सदन उनकी अनुपस्थिति
में ही उस विषय
पर विचार प्रारम्भ
कर सकेगा। यदि
कोई सदस्य अनुपस्थित
हो और अपरिहार्य
परिस्थितिवश
वे अपनी अनुपस्थिति
के कारणों की सूचना
न दे सके हों तो
सदन उनकी प्रार्थना
पर प्रश्न को पुनः
विचारार्थ ले सकेगा। (३) वे सदस्य
जिनके विरूद्ध
शिकायत की गयी
हो सदन में उपस्थित
होकर अपना स्पष्टीकरण
देने के बाद सदन
से बाहर चले जायेंगे
और वे तब तक सदन
में प्रवेश नहीं
करेंगे जब तक कि
वह विषय सदन के
विचाराधीन रहे
किन्तु सदन उन्हें
कार्यवाही सुनने
की अनुमति दे सकेगा
और अतिरिक्त स्पष्टीकरण
के लिये या क्षमा
याचना के लिये
उन्हें पुनः बुला
सकेगा। (४) इस नियम में
उपबद्ध प्रक्रिया
उन व्यक्तियों
के संबंध में भी,
जो सदस्य न हों,
यथोचित परिवर्तनों
सहित प्रवृत्त
होगी। |
|
||
|
६९-
प्रतिवेदन प्रस्तुत
करने के उपरान्त
प्रस्ताव- |
प्रतिवेदन
प्रस्तुत करने
के उपरान्त विशेषाधिकार
समिति के सभापति
अथवा उसके कोई
सदस्य या सदन के
कोई सदस्य यह प्रस्ताव
कर सकेंगे कि समिति
के प्रतिवेदन
पर तुरन्त ही या
किसी भावी समय
में विचार किया
जाय जिसके भीतर
प्रतिवेदन मुद्रित
कराकर
उसकी प्रतिलिपियां
सदस्यों को दी
जा सकें। |
|
||
|
७०-
मूल प्रस्ताव-
जब सदन इस प्रस्ताव
से- |
(१) कि विशेषाधिकार
भंग अथवा अवमान, जो सदन
के प्रत्यक्ष
ही किया गया हो, के प्रश्न
पर विचार किया
जाय, या (२) कि नियम
६७ के अन्तर्गत
विषय पर तत्काल
विचार किया जाय, या (३) कि नियम
६९ के अन्तर्गत
विशेषाधिकार
समिति का प्रतिवेदन
विचारार्थ लिया
जाय, सहमत हो जाय
तो कोई सदस्य मूल
प्रस्ताव प्रस्तुत
कर सकेंगे जिसमें
यथास्थिति विशेषाधिकार
भंग अथवा अवमान
अथवा प्रतिवेदन
को अभिपुष्ट करते
हुए सुझाव होगा
कि सदन को उस पर
क्या कार्यवाही
करनी चाहिये तथा
कोई अन्य सदस्य
प्रस्ताव में
संशोधन प्रस्तुत
कर सकेंगे। |
|
||
|
७१-
दोषारोपित व्यक्ति
के लिये अवसर- |
उस दशा
को छोड़कर जबकि
विशेषाधिकार
की अवहेलना अथवा
अवमान सदन के प्रत्यक्ष
किया गया हो सदन
दण्ड आदेश देने
के पूर्व दोषारोपित
व्यक्ति को उस
पर लगाये गये दोष
के स्पष्टीकरण
या निर्दोशिता-सिद्धि
के संबंध में अपना
पक्ष उपस्थित
करने का अवसर देगा परन्तु यदि
वह विषय विशेषाधिकार
समिति को निर्दिष्ट
किया जा चुका है
और दोषारोपित
व्यक्ति समिति
के समक्ष अपना
पक्ष उपस्थित
कर चुका है तो जब
तक सदन अन्यथा
निर्देश न दे, उस
व्यक्ति के लिये
सदन द्वारा ऐसा
अवसर दिया जाना
आवश्यक न होगा। |
|
||
|
७२-
दोषारोपित पक्ष
का आह्वान- |
अध्यक्ष दोषारोपित
व्यक्ति को सूचना
अथवा बंदीकरण
की अधिपत्र द्वारा
कार्यवाही के
किसी प्रक्रम
पर सदन के सम्मुख
उपस्थित होने
के लिये आहूत कर
सकेंगे। |
|
||
|
७३-
दण्ड- |
(१) सदन
स्वयं अथवा विशेषाधिकार
समिति की सिफारिश
पर निम्नलिखित
दण्ड दे सकता है:- (१) भर्त्सना, (२) शास्ति, (३) सदस्य का निलम्बन, (४) जुर्माना, (५) सदस्य का निष्कासन, (६) कारावास, जिसकी
अवधि सदन के प्रस्ताव
पर निर्भर है परन्तु
सत्रावसान या
विघटन के उपरान्त
आगे नहीं बढ़ सकती
है, और (७) अन्य कोई दण्ड
जिसे सदन अनुच्छेद
१९४ के उपबन्धों
के अन्तर्गत उचित
और ठीक समझे। (२) सदन
की सेवा से निलम्बित
सदस्य सदन के परिसर
में प्रवेश करने
से और सदन तथा समितियों
की कार्यवाही,
में भाग लेने से
वर्जित रहेंगे,
परन्तु अध्यक्ष
किसी निलम्बित
सदस्य को तदर्थ
प्रार्थना किये
जाने पर सदन के
परिसर में किसी
विशेष प्रयोजन
से आने की अनुमति
दे सकेंगे। (३) सदन
प्रस्ताव किये
जाने पर यह आदेश
कर सकेगा कि निलम्बन
का दिया हुआ दण्ड
या उसका असमाप्त
भाग निरस्त किया
जाय । (४) यदि नियम
७३(१) के खण्ड (४)
के अनुसार किसी
व्यक्ति को जुर्माना का दण्ड
दिया जाता है तो
जुर्माने की धनराशि
की वसूली राज्य
सरकार को देय ऋण
के रूप में भूराजस्व
के बकाये की भांति
की जायेगी और वसूली
का प्रमाण-पत्र
सम्बन्धित जिलाधिकारी
को प्रमुख सचिव
के हस्ताक्षर
से जारी किया जा
सकेगा। |
अनु0 १९४ |
||
|
७४-
निराधार शिकायत- |
ऐसी अवस्था
में जबकि सदन को
यह पता चले कि विशेषाधिकार
की अवहेलना अथवा
अवमान का आरोप
निराधार है तो
वह आदेश दे सकेगा
कि शिकायत करने
वाला उस पक्ष को
जिसके विरूद्ध
शिकायत की गयी
हो, वाद-व्यय के
रूप में ऐसी धनराशि
दे जो ५०० रूपये
से अधिक न होगी
। |
|
||
|
७५-
सदन के आदेश का
निष्पादन- |
अध्यक्ष या
उनके द्वारा इस
प्रयोजन के लिये
प्राधिकृत किसी
अन्य व्यक्ति
को यह शक्ति होगी
कि सदन द्वारा
दिये गये आदेशों
और दण्ड का निष्पादन
कर सके। |
|
||
|
७६-
वाद-विवाद की संक्षिप्तता- |
विशेषाधिकार
की अवहेलना अथवा
अवमान विषयक प्रश्नों
पर सभी प्रक्रमों
में वाद-विवाद
संक्षिप्त होगा। |
|
||
|
७७-
प्रक्रिया का
विनियमन- |
समिति
में अथवा सदन में
विशेषाधिकार
अथवा अवमान के
प्रश्न पर विचार
से सम्बद्ध विषयों
की प्रक्रिया
को विनियमित करने
के लिये अध्यक्ष
ऐसे निर्देश दे सकेंगे,
जो आवश्यक हों
। |
|
||
|
७८-
विशेषाधिकार
अथवा अवमान के
प्रश्न को समिति
को निर्दिष्ट करने की
अध्यक्ष की शक्ति- |
इन नियमों
में किसी बात के
रहते हुए भी अध्यक्ष
विशेषाधिकार
अथवा अवमान के
किसी प्रश्न को
परीक्षा, जांच
या प्रतिवेदन
के लिये विशेषाधिकार
समिति को निर्दिष्ट
कर सकेंगे और उससे
सदन को अवगत करायेंगे। |
|
||
|
७९-
एक सदन के सदस्य,
अधिकारी अथवा
सेवक द्वारा किसी
दूसरे सदन के विशेषाधिकार
की अवहेलना अथवा
अवमान पर कार्यवाही की प्रक्रिया- |
यदि दूसरे
सदन या भारत में
किसी अन्य विधान
मण्डल के सदस्य,
अधिकारी या सेवक
इस सदन के अवमान
या अभिकथित विशेषाधिकार
की अवहेलना के
मामले में अन्तर्ग्रस्त
हो तो अध्यक्ष
उस विषय को उस सदन
के अधिष्ठाता
अधिकारी को निर्दिष्ट
कर देंगे परन्तु
यदि प्रश्न उठाने
वाले सदस्य को
सुनने के उपरान्त
अथवा जहां शिकायत
किसी लेख्य पर
आधारित हो वहां
लेख्य का अवलोकन
करने के उपरान्त
अध्यक्ष को यह
समाधान हो जाय
कि विशेषाधिकार
की कोई अवहेलना
नहीं हुई है अथवा
मामला इतना तुच्छ
है कि उस पर ध्यान
देना उचित नहीं
है तो उस दशा में
वे विशेषाधिकार
की अवहेलना के
प्रश्न को अग्राह्यकर
सकेंगे। जब दूसरे
सदन या भारत के
किसी अन्य विधान
मण्डल के अवमान
अथवा विशेषाधिकार
की अभिकथित अवहेलना
का मामला जिसमें
इस सदन के कोई सदस्य,
अधिकारी या सेवक
अन्तर्ग्रस्त
हो, इस सदन को अवमानित
सदन के अधिष्ठाता
अधिकारी द्वारा
निर्दिष्ट किया
जाय तो अध्यक्ष
उस मामले में उसी
प्रकार कार्यवाही
करेंगे जैसे कि
यह सदन के विशेषाधिकार
की अवहेलना का
मामला हो और प्राप्त
हुए मामले में
की गयी जांच तथा
कार्यवाही का
प्रतिवेदन उस
अधिष्ठाता अधिकारी
को जिसने मामला
निर्दिष्ट किया
हो, भेज देंगे। |
|
||
|
सदस्यों
के बन्दीकरण, निरोध
आदि और रिहाई की
अध्यक्ष को सूचना |
||||
|
८०-
दण्डाधिकारी
द्वारा सदस्यों
के बन्दीकरण, निरोध
आदि की अध्यक्ष
को सूचना- |
जब कोई सदस्य
किसी दोषारोपण
या किसी दण्ड्य
अपराध के लिये
बन्दी किये जायं
या उन्हें किसी
न्यायालय द्वारा
कारावास का दण्डादेश
दिया जाय या किसी
कार्यपालिका
के आदेश के अन्तर्गत
निरूद्ध किया
जाय, तो यथास्थिति
न्यायाधीश या
दण्डाधिकारी
या कार्यपालिका
प्राधिकारी अनुसूची
में दिये गये समुचित
प्रपत्र में यथास्थिति,
बन्दीकरण, निरोध
या दोष-सिद्धि
के कारण तथा सदस्य
के निरोध या कारावास
का स्थान भी दर्शाते हुए ऐसे
तथ्य की सूचना
शीध्रता के साथ अध्यक्ष
को देगा। |
|
||
|
८१-
सदस्य की रिहाई
पर अध्यक्ष को
सूचना- |
जब कोई सदस्य
बन्दी किये जायं
और दोषसिद्धि
के बाद अपील लम्बित
होने तक जमानत
पर रिहा किये जायं
या अन्यथा रिहा
किये जायं तो ऐसे
तथ्य की सूचना
भी संबंधित प्राधिकारी
द्वारा अनुसूची
में दिये गये समुचित
प्रपत्र में अध्यक्ष
को दी जायेगी। |
|
||
|
८२-
दण्डाधिकारी
से प्राप्त सूचना
पर कार्यवाही-
|
नियम
८० या ८१ में निर्दिष्ट
संसूचना, जो वायरलेस
संदेश, टेलीप्रिन्टर
अथवा तार द्वारा
भी भेजी जा सकेगी
प्राप्त होने
के बाद यथा संभव
शीध्र अध्यक्ष
उसे सदन में पढ़कर
उसे सुनायेंगे,
यदि वह उपवेशन
में हो या यदि सदन
उपवेशन में न हो
तो निर्देश देंगे
कि सदस्यों को
उसकी सूचना दे
दी जाय: परन्तु
यदि किसी ऐसे सदस्य
के जमानत पर या
अन्यथा प्रमुक्त
होने की सूचना
सदन को मूल कारावास
की सूचना दिये
जाने से पहले ही
प्राप्त हो जाय
तो उसके बन्दीकरण
या कारावासित
होने तथा बाद में
प्रमुक्त होने
के तथ्य को अध्यक्ष
चाहें तो सदन को
सूचित न करें। |
|
||
|
सदन के परिसर
के भीतर विधि सम्बन्धी
आदेशिका की तामीली
तथा गिरफ्तारी
से संबंधित प्रक्रिया |
||||
|
८३-
सदन के परिसर के
भीतर बन्दीकरण- |
सदन के परिसर
के भीतर अध्यक्ष
की अनुज्ञा प्राप्त
किये बिना कोई
गिरफ्तारी नहीं
की जायेगी। |
|
||
|
८४-
विधि संबंधी आदेशिका
की तामीली- |
दीवानी या फौजदारी
विधि संबंधी आदेशिका
सदन के परिसर के
भीतर अध्यक्ष
की अनुज्ञा प्राप्त
किये बिना तामील
नहीं की जायेगी। |
|
||
|
अध्याय
12 |
||||
|
८५-
असरकारी सदस्यों
द्वारा संकल्पों
की सूचना- |
जो असरकारी
सदस्य कोई संकल्प
प्रस्तुत करना
चाहें तो वे प्रमुख
सचिव को अपने इस
मन्तव्य की लिखित
सूचना कम से कम
१५ दिन पहले देंगे
और सूचना के साथ
उस संकल्प की एक
प्रति भेजेंगे
जिसे वे प्रस्तुत
करना चाहते हैं। |
|
||
|
८६-
शासन द्वारा संकल्प
की सूचना- |
यदि मंत्री
कोई संकल्प उपस्थित करना
चाहें तो वे सात
दिन की सूचना देंगें
और उसके साथ संकल्प
की एक प्रति प्रमुख
सचिव को भेजेंगे
जो साधारणतया
उसकी प्राप्ति
के अड़तालिस घंटों
के भीतर उसकी प्रतिलिपियां
सदस्यों को भिजवायेंगेः परन्तु अध्यक्ष
इससे कम समय की
सूचना स्वीकार
कर सकेंगे। |
|
||
|
८७-
संकल्प का वाद
विषय- |
इन नियमों के
उपबन्धों के अधीन
कोई सदस्य अथवा
मंत्री सामान्य
लोक हित के किसी
विषय के संबंध
में संकल्प प्रस्तुत
कर सकेंगे। |
|
||
|
८८-
संकल्प का रूप- |
संकल्प राय
की घोषणा अथवा
सिफारिश के रूप
में हो सकेगा या
ऐसे रूप में हो
सकेगा जिससे कि
शासन के किसी कार्य
अथवा नीति का सदन
द्वारा अनुमोदन
या अननुमोदन अभिलिखित
किया जाय या कोई
संदेश दिया जाय
या किसी कार्यवाही
के लिए संस्तवन,
अनुरोध अथवा प्रार्थना
की जाय या किसी
विषय अथवा स्थिति
पर शासन के विचारार्थ
ध्यान आकृष्ट
किया जाय या किसी
ऐसे अन्य रूप में
हो सकेगा जो अध्यक्ष
उचित समझें। |
|
||
|
८९-
संकल्प की ग्राह्यता
की शर्ते- |
किसी
संकल्प के ग्राह्य
होने के लिए यह
आवश्यक है कि वह
निम्नलिखित शर्तों
को पूरा करे, अर्थात्- (१) वह स्पष्टतया
और सुतथ्यतः व्यक्त
किया जायेगा, (२) उससे
सारतः एक ही निश्चित
वाद-विषय उठाया
जायेगा, (३) उसमें
प्रतर्क, अनुमान,
व्यंग्यात्मक
पद, लांछन या मान-हानिकारक
कथन नहीं होंगे, (४) उसमें
व्यक्तियों की
सरकारी या सार्वजनिक
हैसियत के अतिरिक्त
उनके आचरण या चरित्र
का निर्देश नहीं
होगा, तथा (५) उसका
किसी ऐसे विषय
से संबंध नहीं
होगा जो भारत के
किसी भाग में क्षेत्राधिकार
रखने वाले किसी
न्यायालय के न्यायनिर्णयन
के अन्तर्गत हो। |
|
||
|
९०-
न्यायाधिकरण
अथवा संविहित
प्राधिकारी के
समक्ष उपस्थित
विषय पर चर्चा उठाना- |
ऐसे संकल्प
को प्रस्तुत करने
की अनुज्ञा नहीं
दी जायेगी जो किसी
ऐसे विषय पर चर्चा
उठाने के लिए हो
जो किसी न्यायिक
या अर्द्ध न्यायिक
कृत्य करने वाले
किसी संविहित
न्यायाधिकरण
या संविहित प्राधिकारी
के या किसी विषय
की जांच या अनुसंधान
करने के लिए नियुक्त
किसी आयोग या जांच
न्यायालय के सामने
लम्बित
हों: परन्तु
यदि अध्यक्ष का
समाधान हो जाय
कि इससे न्यायाधिकरण,
आयोग या जांच न्यायालय
द्वारा उस विषय
के बारे में विचार
किये जाने पर प्रतिकूल
प्रभाव पड़ने
की आशंका नहीं
है तो अध्यक्ष,
स्वविवेक से ऐसे
विषय को सदन में
उठाने की अनुमति
दे सकेंगे, जो जांच
की प्रक्रिया
या व्याप्ति या
प्रक्रम से संबंधित
हों। |
|
||
|
९१-
संकल्पों की ग्राह्यता- |
अध्यक्ष, संकल्प
की ग्राह्यता
के बारे में विनिश्चय
करेंगे और संकल्प
को नियमानुकूल
बनाने के लिये
स्वविवेक से उसके
रूप में परिवर्तन
कर सकेंगे। वे
किसी संकल्प या
उसके किसी भाग
को अस्वीकृत कर
सकेंगे जो नियमानुकूल
न हो अथवा संकल्प
प्रस्तुत करने
के अधिकार का दुरूपयोग
हो अथवा किसी अन्य
प्रकार से सदन
की प्रक्रिया
में बाधा या उस
पर प्रतिकूल प्रभाव
डालने के लिए आयोजित
हो। |
|
||
|
९२-
असरकारी सदस्य
के संकल्प की प्रतिलिपि
शासन को भेजा जाना- |
असरकारी सदस्य
का संकल्प यदि
शलाका में स्थान
प्राप्त कर ले
और अध्यक्ष द्वारा
ग्रहीत हो जाय
तो उस पर चर्चा
के लिए नियत दिनांक
से साधारणतया
१२ दिन पूर्व उसकी
एक प्रतिलिपि शासन को भेजी
जायेगी। |
|
||
|
९३-
संकल्पों का प्रस्तवन
तथा वापसी- |
(१) कार्य-सूची
में जिन सदस्यों
के नाम में संकल्प
हो वे अथवा कोई
दूसरे सदस्य, जिनको
उन्होंने अपनी
ओर से कार्य करने
के लिए प्राधिकृत
किया हो, पुकारे
जाने पर संकल्प
को प्रस्तुत करेंगे
और उस दशा में कार्य-सूची
में दिए हुए शब्दों
में औपचारिक प्रस्ताव
के साथ अपना भाषण
देंगे अथवा यदि
वे संकल्प प्रस्तुत
न करना चाहें तो
उस दशा में वे अपना
कथन उस बात तक ही
सीमित रखेंगे:
परन्तु अध्यक्ष
स्वविवेक से उस
सदस्य को संक्षेप
में यह वक्तव्य
देने की अनुज्ञा
दे सकेंगे कि वे
संकल्प को क्यों
प्रस्तुत करना
नहीं चाहते । (२) यदि सदस्य
पुकारे जाने के
समय अनुपस्थित
हों तो और उप नियम
(१) के अन्तर्गत
किसी दूसरे सदस्य
को उनकी ओर से कार्य
करने के लिए नियमित
रूप से प्राधिकृत
न किया गया हो तो
उनके नाम में अंकित
संकल्प व्यपगत
हो जायेगा। |
|
||
|
९४-
संशोधन- |
जब कोई संकल्प
चर्चाधीन हो तो
कोई सदस्य संकल्पों
से संबंधित नियमों
के अधीन रहते हुए
उस संकल्प पर संशोधन
प्रस्तुत कर सकेंगे। |
|
||
|
९५-
संशोधनों की सूचना- |
(१) यदि
संशोधन की एक प्रति
संकल्प पर चर्चा
के लिए निश्चित
दिन के छत्तीस
घंटे पूर्व प्रमुख
सचिव को न दी जा
चुकी हो तो कोई़
सदस्य उस संशोधन
के प्रस्तावित
किये जाने पर आपत्ति
कर सकेंगे और यह
आपत्ति अभिभावी
होगी जब तक कि अध्यक्ष
संशोधन को प्रस्तावित
करने की अनुज्ञा
न दे दें। (२) जिन संशोधनों
की सूचना दी गयी
हो उनकी सूचियां
प्रमुख सचिव, यदि
समय हो, तो सदस्यों
के लिए समय-समय
पर उपलब्ध करेंगे। |
|
||
|
९६-
भाषणों की समय-सीमा- |
किसी
भाषण की अवधि अध्यक्ष
की अनुज्ञा के
बिना पंद्रह मिनट
से अधिक नहीं होगीः परन्तु
संकल्प का प्रस्तावक
उसे प्रस्तुत
करते समय और सम्बद्ध
विभाग का भार-साधक
मंत्री, जब वे उस
पर पहली बार बोलें,२५
मिनट तक या इससे
इतने और अधिक समय
तक जिसकी अध्यक्ष
अनुज्ञा दें, बोल सकेंगे। |
|
||
|
९७-
संकल्प की वापसी- |
(१) कोई
सदस्य, जिन्होंने
संकल्प या किसी
संकल्प पर संशोधन
प्रस्तुत किया
हो, सदन की अनुज्ञा
के बिना उसे वापस
नहीं लेंगे। (२) वापस लेने
की अनुज्ञा मांगने
के प्रस्ताव पर
चर्चा की अनुमति
नहीं दी जायेगी। |
|
||
|
९८-
संकल्प जिन पर
चर्चा नहीं
हुई- |
यदि किसी संकल्प
पर, जिसकी सूचना
दी जा चुकी हो और
जो कार्य-सूची
में प्रविष्ट
किया जा चुका हों,
उस उपवेशन में
चर्चा न हुई हो
तो उसको व्यपगत
हुआ समझा जायेगा। |
|
||
|
९९
-संकल्प का विभाजन- |
जब किसी संकल्प
पर, जिसमें कई प्रश्न
अन्तर्ग्रस्त
हों, चर्चा हो चुकी
हो, तब अध्यक्ष
उस संकल्प को स्व
विवेक से विभाजित
कर सकेंगे और उसके
प्रत्येक या किसी
अंश को, जैसा भी
वे उचित समझें, पृथक मत के
लिए रख सकेंगे। |
|
||
|
१००-
संकल्प की पुनरावृत्ति- |
अन्यथा उपबन्धित
अवस्था को छोड़कर
यदि कोई संकल्प
लम्बित
हो अथवा निस्तीर्ण किया जा
चुका हो तो यथास्थिति
संकल्प के लम्बनकाल
में अथवा उसके
निस्तारण की तिथि
से ६ महीने के भीतर
कोई ऐसा संकल्प
या संशोधन प्रस्तुत
नहीं किया जायेगा
जिसमें सारतः
वही वाद विषय या
प्रश्न उठाया
जाय जो पूर्व संकल्प
में अन्तर्निहित
था। |
|
||
|
१०१-
मंत्री के पास
पारित संकल्प
की प्रति भेजना- |
प्रत्येक संकल्प
की, जिसे सदन ने
पारित किया हो,
एक प्रति सम्बद्ध
मंत्री के पास
भेजी जायेगी। |
|
||
|
१०२-
असरकारी सदस्यों
के संकल्पों की
अग्रेता- |
(१) संकल्पों
की सूचनाओं की,
जो असरकारी सदस्यों
ने प्रस्तुत की
हो, सापेक्ष अग्रेता
का निर्णय अध्यक्ष
द्वारा दिये गये
निर्देशों के
अनुसार की जाने
वाली शलाका द्वारा
उस दिवस को होगा
जो अध्यक्ष नियत
करें। (२) जब तक
अध्यक्ष अन्यथा
निर्देशे न दें,
असरकारी सदस्यों
के संकल्पों के
निस्तारण के निमित्त
किसी दिन की कार्य-सूची
में (नियम २५ के
परन्तुक के अन्तर्गत
अवशिष्ट किसी
संकल्प के अतिरिक्त)
पांच से अधिक संकल्प
नहीं रखे जायेंगे। |
|
||
|
अध्याय
१३ |
||||
|
१०३-
लोक हित के किसी
विषय पर प्रस्ताव
द्वारा चर्चा- |
संविधान या
इन नियमों में
अन्यथा उपबन्धित
अवस्था को छोड़कर
अध्यक्ष की सम्मति
से किये गये प्रस्ताव
के बिना सामान्य
लोक-हित के विषय
पर कोई चर्चा नहीं
होगी। |
|
||
|
१०४-
प्रस्ताव की सूचना- |
नियम ११० में
उपबन्धित अवस्था
को छोड़कर प्रस्ताव
की सूचना लिखित
रूप में दी जायेगी
और प्रमुख सचिव
को सम्बोधित होगी। |
|
||
|
१०५-
प्रस्ताव की ग्राह्यता
की शर्तें- |
कोई प्रस्ताव
ग्राह्य हो सके
तो इसके लिए वह
निम्न शर्तें पूरी करेगा,
अर्थात् कि- (१) उसमें
सारवान रूप से
एक ही निश्चित्
प्रश्न उठाया
जायेगा, (२) उसमें
प्रतर्क, अनुमान,
व्यंगात्मक पद,
अभ्यारोप या मान-
हानिकारक कथन
नहीं होंगे, (३) उसमें
व्यक्तियों की
सार्वजनिक हैसियत
के अतिरिक्त उनके
आचरण या चरित्र
के निर्देश नहीं
होंगे, (४) उसमें
विशेषाधिकार
का प्रश्न नहीं
उठाया जायेगा, (५) उसमें
ऐसे विषय पर फिर
से चर्चा नहीं
उठायी जायेगी
जिस पर उसी सत्र
में अथवा पिछले
६ मास के भीतर, जो
भी समय पहले पड़ता
हो, चर्चा हो चुकी
हो, (६) उसमें
ऐसे विषय की पूर्वाशा
नहीं की जायेगी
जिस पर उसी सत्र
में चर्चा होने
की संभावना हो, (७) वह किसी ऐसे
विषय से संबंधित
नहीं होगा जो भारत
के किसी भाग में
क्षेत्राधिकार
रखने वाले किसी
न्यायालय के न्याय
निर्णयन के अन्तर्गत
हो। |
|
||
|
१०६-
अध्यक्ष प्रस्ताव
की ग्राह्यता
का विनिश्चय करेंगे- |
अध्यक्ष विनिश्चय
करेंगे कि कोई
प्रस्ताव या उसका
कोई भाग इन नियमों
के अन्तर्गत ग्राह्य़ है अथवा नहीं
और वे कोई प्रस्ताव
या उसका कोई भाग
अस्वीकृत कर सकेंगे
जो उनकी राय में
प्रस्ताव प्रस्तुत
करने के अधिकार
का दुरूपयोग हो
या सदन की प्रक्रिया
में बाधा डालने
या उस पर प्रतिकूल
प्रभाव डालने
के लिये आयोजित
हो या इन नियमों
का उल्लंघन करता
हो। |
|
||
|
१०७-
न्यायाधिकरण, आयोग आदि के
समक्ष विषयों
पर चर्चा उठाने
के लिये प्रस्ताव-
|
ऐसे
प्रस्ताव प्रस्तुत
करने की अनुज्ञा
नहीं दी जायेगी
जो किसी ऐसे विषय
पर चर्चा उठाने
के लिये हो जो किसी
न्यायिक या अर्ध-न्य़ाय़िक कृत्य करने
वाले किसी संविहित
न्यायाधिकरण
या संविहित प्राधिकारी
के या किसी विषय
की जांच या अनुसंधान
करने के लिये नियुक्त
किसी आयोग या जांच
न्यायालय के सामने
लम्बित हो। परन्तु
यदि अध्यक्ष का
समाधान हो जाय
कि इससे न्यायाधिकरण, संविहित अधिकारी, आयोग या जांच
न्यायालय द्वारा
उस विषय के विचार
किये
जाने पर प्रतिकूल
प्रभाव पड़ने
की आशंका नहीं
है तो, अध्यक्ष,
स्वविवेक से ऐसे
विषय को सदन में
उठाने की अनुमति
दे सकेंगे जो जांच
की प्रक्रिया
या व्याप्ति या
प्रक्रम से संबंधित
हो। |
|
||
|
१०८-
समय-नियतन और प्रस्तावों
पर चर्चा- |
अध्यक्ष, सदन के कार्य
की स्थिति पर विचार
करने के बाद ऐसे
किसी प्रस्ताव
पर चर्चा के लिये
कोई एक दिन या अधिक
दिन या किसी दिन
का भाग नियत कर
सकेंगे। |
|
||
|
१०९-
भाषणों के लिये
समय-सीमा- |
अध्यक्ष, यदि वे ठीक
समझें भाषणों के
लिये समय-सीमा
विहित कर सकेंगे। |
|
||
|
११०-
बिना सूचना के
प्रस्ताव- |
निम्नलिखित
प्रस्ताव यदि
अध्यक्ष अनुज्ञा
दें, बिना सूचना
के किये जा सकेंगे- (१) संवेदना
या बधाई प्रस्ताव, (२) उपवेशन
स्थगित करने का
प्रस्ताव, (३) अजनबियों
को हटाने का प्रस्ताव, (४) समितियों
के लिये सदस्यों
के निर्वाचन का
प्रस्ताव, (५) किसी
विधेयक या संकल्प
या प्रस्ताव या
उस पर संशोधन को
वापस लेने का प्रस्ताव, (६) किसी
कार्य को स्थगित
करने का प्रस्ताव, (७) वाद-विवाद
को समाप्त करने
का प्रस्ताव, (८) किसी
नियम के निलम्बन
का प्रस्ताव, (९) किसी
उपवेशन की कालावधि
बढ़ाने का प्रस्ताव, (१०) राज्यपाल
के अभिभाषण पर
धन्यवाद का प्रस्ताव। |
|
||
|
१११-
प्रस्ताव की पुनरावृत्ति- |
अन्यथा उपबन्धित
अवस्था को छोड़कर
यदि कोई प्रस्ताव
लम्बित हो अथवा
निस्तीर्ण किया
जा चुका हो तो यथास्थिति
प्रस्ताव के लम्बनकाल
में अथवा उसके
निस्तारण की तिथि
से ६ महीने के भीतर
कोई ऐसा प्रस्ताव
या संशोधन प्रस्तुत
नहीं किया जायेगा
जिसमें सारत: वही
वाद-विषय या प्रश्न
उठाया जाय जो पूर्व
प्रस्ताव में
अन्तर्निहित
था: परन्तु
जब तक अध्यक्ष
अन्यथा निर्देश
न दें, यहां कही
गयी किसी बात से
निम्नलिखित प्रस्तावों
में से किसी प्रस्ताव
के प्रस्तुत किये
जाने को रोका गया
नहीं समझा जायेगा,
अर्थात्- (क) किसी
विधेयक को विचारार्थ
लेने या प्रवर
समिति या संयुक्त
प्रवर समिति को
निर्दिष्ट करने
का प्रस्ताव जब
उसी प्रकार के
पिछले प्रस्ताव
पर इस आशय का कोई
संशोधन कि उस पर
राय जानने के लिये
विधेयक को घुमाया
जाय या पुनः घुमाया
जाय, स्वीकृत हो
गया हो; (ख) सभा
के पुनर्विचार
के लिये राज्यपाल
द्वारा विधेयक
का प्रत्यावर्तन
किये जाने के उपरान्त
किया गया कोई प्रस्ताव,
जो ऐसे संशोधन
के लिये किया जाय
तो पुनर्विचारार्थ
निर्दिष्ट विषय
या विषयों से सुसंगत
हो; (ग) किसी विधेयक
के संशोधन का प्रस्ताव
जो किसी अन्य संशोधन
को, जो स्वीकार
हो चुका हो, आनुषंगिक
हो या केवल उसका
प्रारूपण बदलने
के लिये आयोजित
हो। |
|
||
|
११२-
कार्य-स्थगित करने
के लिये प्रस्ताव- |
(१) अनुच्छेद
२०४ के अन्तर्गत
विनियोग विधेयक
के अतिरिक्त किसी
अन्य विधेयक पर,
जो पुरःस्थापित
किया जा चुका हो
अथवा कार्य-स्थगन
प्रस्ताव के अतिरिक्त
किसी अन्य प्रस्ताव
पर अथवा संकल्प
पर विचार को उसी
सत्र में ऐसे कार्य
के लिये उपलब्ध
किसी भावी दिन
अथवा भावी सत्र
में अनिश्चित
काल के लिये स्थगित
करने का प्रस्ताव
किसी भी सदस्य
द्वारा किसी समय
प्रस्तुत किया
जा सकेगा और ऐसे
प्रस्ताव को तत्समय
सभा के सम्मुख
अन्य प्रस्तावों
पर अग्रेता होगी।
अध्यक्ष, प्रस्तावक
को तथा यदि प्रस्ताव
का विरोध किया
जाय तो विरोध करने
वाले सदस्य को
संक्षिप्त व्याख्यात्मक
वक्तव्य देने
का अवसर देने के
बाद और आगे वाद-विवाद
के बिना उस पर प्रश्न
उपस्थित कर सकेंगे। (२) असरकारी
सदस्यों के कार्य
को किसी निर्धारित
दिन के लिये स्थगित
करने का प्रस्ताव
स्वीकृत हो जाय
तो स्थगित कार्य
को उस दिन के लिये
नियत सरकारी सदस्यों
के कार्य पर प्राथमिकता
मिलेगी। (३) अध्यक्ष
कार्य स्थगित
करने के ऐसे प्रस्ताव
को अस्वीकृत कर
सकेंगे यदि उनकी
राय में प्रस्ताव
सभा के कार्य में
बाधा डालने या
उपवेशन को स्थगित
कराने के प्रयोजन
से किया गया है। |
अनु0 204 |
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११३-
विवादान्त- |
(१) किसी
प्रस्ताव के किये
जाने के उपरान्त
किसी समय भी कोई
सदस्य यह प्रस्ताव
कर सकेंगे कि
"अब प्रश्न उपस्थित
किया जाय" और जब
तक कि अध्यक्ष
को यह प्रतीत न
हो कि प्रस्ताव
इन नियमों का दुरूपयोग
है या युक्ति-युक्त वाद-विवाद के अधिकार
का उल्लंघन करता
है, अध्यक्ष प्रस्ताव
रखेंगे कि "अब
प्रश्न उपस्थित
किया जाय"। (२) जब उप
नियम (१) के अन्तर्गत
प्रस्ताव स्वीकृत
हो जाय तो उसके
आनुषंगिक प्रश्न या
प्रश्नों को और
आगे वाद-विवाद
के बिना तत्काल
प्रस्तुत कर दिया
जायगा: परन्तु अध्यक्ष
किसी सदस्य के
उत्तर देने के
अधिकार को अनुज्ञापित
करेंगे जो उसे
इन नियमों के अन्तर्गत
प्राप्त हो |
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अध्याय
१४ |
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११४-
विधेयकों को पुरः
स्थापित करने
से पूर्व प्रकाशित
करने की अध्यक्ष
की शक्ति- |
अध्यक्ष
से इस विषय की प्रार्थना
की जाने पर वे किसी
सरकारी विधेयक
(उद्देश्यों और
कारणों के विवरण
एवं विधायिनी
शक्ति के प्रत्यायोजन
तथा वित्तीय आभारों
से संबंधित ज्ञापनों
सहित यदि कोई हों
और यदि आवश्यक
हो तो राष्ट्रपति
की पूर्व मंजूरी
या राज्यपाल की
सिफारिश सहित)
गजट में प्रकाशन
का आदेश दे सकेंगे
यद्यपि विधेयक
को पुरःस्थापित
करने की अनुज्ञा
के लिये कोई प्रस्ताव
नहीं रखा गया हो।
उस दशा में विधेयक
को पुरः स्थापित
करने की अनुज्ञा
के लिए प्रस्ताव
करना आवश्यक नहीं
होगा और यदि विधेयक
बाद में पुरःस्थापित
किया जाय तो उसको
पुनः प्रकाशित
करने की आवश्यकता
नहीं होगी: परन्तु साधारणतया
विधेयक को इस प्रकार
गजट में प्रकाशित
करना आवश्यक नहीं
होगा यदि सदन सत्र
में हो । |
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११५-
असरकारी सदस्य
द्वारा विधेयक
के पुर:स्थापन
की अनुज्ञा मांगने
के लिए प्रस्ताव
की सूचना- |
(१) असरकारी
सदस्य जो किसी
विधेयक को पुरःस्थापित
करने की अनुज्ञा
के लिए प्रस्ताव
करना चाहते हों
अपने इस अभिप्राय
की सूचना देंगे
और सूचना के साथ
विधेयक की एक प्रति
तथा उद्देश्यों
और कारणों का एक
विवरण जिसमें
प्रतर्क नहीं
होंगे, भेजेंगे: परन्तु अध्यक्ष
यदि ठीक समझें,
उददेश्यों और
कारणों के विवरण
को पुनरीक्षित
कर सकेंगे। (२) यदि
किसी ऐसे विधेयक
को पुर:स्थापित
करने की सूचना
दी जाय जो अध्यक्ष
की राय में राष्ट्रपति
की पूर्व मंजूरी
अथवा राज्यपाल
की सिफारिश के
बिना पुर:स्थापित
नहीं किया जा सकता,
तो अध्यक्ष सूचना
की प्राप्ति के
उपरान्त यथाशीध्र
उस विधेयक को, यथास्थिति, राष्ट्रपति
या राज्यपाल को
निर्दिष्ट करेंगे। (३) इस नियम के
अन्तर्गत विधेयक
को पुर:स्थापित
करने की अनुज्ञा
के लिये प्रस्ताव
की सूचना की कालावधि
पन्द्रह दिन होगी,
यदि अध्यक्ष इससे
कम समय की सूचना
पर प्रस्ताव किये
जाने की अनुज्ञा
न दे दें। |
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११६-
सदन में लम्बित
किसी अन्य विधेयक
पर निर्भर विधेयक
का पुरःस्थापन- |
कोई विधेयक
जो सदन में किसी
अन्य लम्बित विधेयक
पर पूर्णतः या
अंशतः निर्भर
है उस विधेयक के
पारित हो जाने
की प्रत्याशा
में, जिस पर कि वह
निर्भर है, सदन
में पुर:स्थापित
किया जा सकेगा: परन्तु ऐसा
विधेयक सदन में
विचार किये जाने
तथा पारित किये
जाने के लिए तभी
लिया जायेगा जबकि
लम्बित विधेयक
दोनो सदनों द्वारा
पारित किया जा
चुका हो, और यथास्थिति,
राष्ट्रपति अथवा
राज्यपाल द्वारा
उस पर अनुमति दी
जा चुकी हो। |
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११७-
तत्सम विधेयक
की सूचना- |
जब कोई विधेयक
सदन में लम्बित
हो तो
किसी तत्सम विधेयक
की सूचना को चाहे
वह लम्बित विधेयक
के पुरःस्थापन
से पहले प्राप्त
हुई हो या बाद में,
जब तक कि अध्यक्ष
अन्यथा निर्देश
न दें, यथास्थिति
लम्बित सूचनाओं
की सूची से निकाल
दिया जायेगा या
उसमें प्रविष्ट
नहीं किया जायगा। |
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११८-
विधेयकों का वित्तीय
ज्ञापन और विधेयकों
में धन खण्ड- |
(१) जिस विधेयक
में व्यय अन्तर्ग्रस्त
हो, उसके साथ एक
वित्तीय ज्ञापन
होगा जिसमें व्यय
अन्तर्ग्रस्त
होने वाले खण्डों
की ओर विशेषतया
ध्यान दिलाया
जायगा और उसमें
उस आवर्तक तथा
अनावर्तक व्यय
का भी प्राक्कलन
दिया जायेगा जो
विधेयक के विधि
रूप में पारित
होने की अवस्था
में अन्तर्ग्रस्त
हो। (२) विधेयकों
के जिन खण्डों
या उपबन्धों में
लोकनिधियों में
से व्यय अन्तर्ग्रस्त
हो वे अपेक्षाकृत
मोटे अक्षरों
या वक्राक्षरों
में छापे जायेंगे: परन्तु
जहां किसी विधेयक
में कोई खण्ड जिसमें
व्यय अन्तर्ग्रस्त
हो, मोटे टाइप या
वक्राक्षरों
में न छापा जाय
तो अध्यक्ष, विधेयक
के भार-साधक सदस्य
को ऐसे खण्डों
को सभा की जानकारी
में लाने की अनुज्ञा
दे सकेंगे। |
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११९-
विधायिनी शक्ति
प्रत्यायोजित
करने वाले विधेयकों
का व्याख्यात्मक
ज्ञापन- |
जिस विधेयक
में विधायिनी
शक्ति के प्रत्यायोजन
के साथ प्रस्थापनायें
अन्तर्ग्रस्त
हों उसके साथ एक
ज्ञापन होगा जिसमें
ऐसी प्रस्थापनाओं
की व्याप्ति की
व्याख्या होगी। |
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१२०-
अध्यादेशों के
सम्बन्ध में विवरण- |
(१) जब कभी
कोई अध्यादेश
प्रख्यापित किया
जाय तो उसके प्रख्यापन
के बाद, यथास्थिति,
अनुगामी सत्र
अथवा उपवेशन के
प्रारम्भ में
अध्यादेश की प्रतिलिपि
सहित ऐसा विवरण
पटल पर रखा जायेगा
जिसमें उन परिस्थितियों
को स्पष्ट किया
गया हो जिनके कारण
अध्यादेश द्वारा
तुरन्त विधान
बनाना आवश्यक
हो गया था । (२) तदुपरान्त
कोई भी सदस्य तीन
दिन की सूचना देकर
अध्यादेश का अननुमोदन
करने का संकल्प
प्रस्तुत कर सकेगा
और यदि ऐसा संकल्प
स्वीकृत हो जाय
तो वह परिषद् के
पास उसकी सहमति
के लिए भेज दिया
जायगा। (३) जब कभी कोई
विधेयक जो किसी
अध्यादेश को रूपभेद
सहित प्रतिस्थापित
करता हों, सदन में
पुरःस्थापित
किया जाय तो सदन
के समक्ष विधेयक
के साथ एक विवरण
भी रखा जायगा जिसमें
उन परिस्थितियों
को स्पष्ट किया
गया हो जिनके कारण
ऐसा रूपभेद करना
आवश्यक हो गया
था। |
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१२१-
असरकारी सदस्यों
के विधेयकों में
अग्रेता- |
(१) विधेयकों
की सूचनाओं की,
जो असरकारी सदस्यों
ने प्रस्तुत की
हो, सापेक्ष अग्रेता
का निर्णय शलाका
द्वारा होगा, जो
अध्यक्ष द्वारा
दिये गये उन निदेशों
के अनुसार उस दिवस
को होगा जो अध्यक्ष
नियत करें और जो
ऐसे दिवस से कम
से कम पन्द्रह
दिन पूर्व होगा
जिसके लिये शलाका
की जाय । (२) असरकारी
सदस्यों के विधेयकों
की सापेक्ष अग्रेता,
जो सदन में लम्बित
हों, निम्न क्रम
में निर्धारित
की जायेगी:- (क)
वे विधेयक जो राज्यपाल
द्वारा अनुच्छेद
२०० और २०१ के अन्तर्गत
और संदेश सहित
वापस किये गये
हों; (ख)
वे विधेयक जिनके
सम्बन्ध में उनके
पारित किये जाने
का प्रस्ताव प्रस्तुत
किया जा चुका हो; (ग)
वे विधेयक जो सभा
द्वारा पारित
तथा परिषद् द्वारा
संशोधन सहित लौटाये
गये हों ; (घ)
वे विधेयक जो परिषद्
द्वारा पारित
तथा सभा को पंहुचाये
गये हों; (ङ)
वे विधेयक जिनके
सम्बन्ध में वह
प्रस्ताव स्वीकृत
हो चुका है कि विधेयक
पर विचार किया
जाय; (च)
वे विधेयक जिनके
सम्बन्ध में प्रवर
समिति का प्रतिवेदन
उपस्थित किया
जा चुका हों; (छ)
वे विधेयक जो राय
जानने के लिये
परिचालित किये
गये हों;
(ज)
वे विधेयक जिनका
पुर:स्थापन हो
चुका हो और जिनके
सम्बन्ध में कोई
और प्रस्ताव उपस्थित
या स्वीकृत न किया
गया हो; (झ)
अन्य विधेयक। (३)
उप नियम (२) के किसी
एक खण्ड के अन्तर्गत
आने वाले विधेयकों
की सापेक्ष अग्रेता
शलाका द्वारा
ऐसे समय पर और ऐसे
ढंग से, जैसा कि
अध्यक्ष निर्देश
दें, निर्धारित
की जायेगी । (४) अध्यक्ष
विशेष आदेश द्वारा
जो सभा में विघोषित
किया जायेगा उप
नियम (२) में दिये
गये विधेयकों
की सापेक्ष अग्रेता
में ऐसे परिवर्तन
कर सकेंगे जो वे
आवश्यक या सुविधाजनक
समझें। |
अनु0 200 और 201 |
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१२२-
मंत्री को असरकारी
सदस्य के विधेयक
की प्रतिलिपि
भेजना- |
जब कभी सभा
का कोई असरकारी
सदस्य किसी विधेयक
को पुरःस्थापित
करने की अनुज्ञा
मांगने के लिये
प्रस्ताव प्रस्तुत
करने के अभिप्राय
की सूचना दे और
यदि उसे शलाका
में स्थान प्राप्त
हो जाय तो प्रमुख
सचिव यथाशीध्र
उसकी एक प्रतिलिपि
उद्देश्यों और
कारणों के विवरण
सहित सम्बन्धित
मंत्री को भेज
देंगे । |
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१२३-
पुरःस्थापन की
अनुज्ञा के लिए
प्रस्ताव- |
(१) नियम
११४ के अधीन रहते
हुए किसी भी विधेयक
की पुरःस्थापना
के पूर्व सदन में
तदर्थ प्रस्ताव
द्वारा अनुज्ञा
प्राप्त की जायेगी,
परन्तु अध्यक्ष
के अधीन रहते हुए
उस समय तक ऐसा कोई
प्रस्ताव नहीं
किया जायेगा जब
तक कि विधेयक की
प्रतिलिपियां
प्रस्ताव करने
के दिन से पूर्व
दिनांक को सदस्यों
को उपलब्ध न करा
दी गयी हों। (२) यदि ऐसे प्रस्ताव का विरोध किया जाय तो अध्यक्ष, यदि वे ठीक समझें, प्रस्ताव करने वाले सदस्य और प्रस्ताव का विरोध करने वाले सदस्य द्वारा संक्षिप्त व्याख्यात्मक वक्तव्य दिये जाने की अनुज्ञा देने के पश्चात् और बिना वाद-विवाद के प्रश्न रख सकेंगे: | |||